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किसानों के साथ

भारतीय परिदृश्य में कृषि और किसानों का कल्याण सुनिश्चित करना है तो इन्हीं 86 प्रतिशत किसानों को ध्यान में रख कर रणनीति और कार्ययोजना तैयार करनी होगी तभी जमीन पर कुछ अनुकूलपरिणाम मिल सकते हैं।

Author January 8, 2018 2:39 AM
अपने खेतों में खड़ा एक किसान। (Photo Source: Indian Express Archive)

उपभोक्ता सजगता
आम जनता द्वारा चिकित्सा पर अपनी गाढ़ी कमाई, उपभोक्ता जागरूकता के अभाव के चलते बर्बाद हो रही है। दवा के नाम पर तरह-तरह से ठगी की जा रही है। नियम से किसी भी दवा को पूरी ‘स्ट्रिप’ के साथ बेचा जाना चाहिए ताकि हमें पता चल सके कि दवा के दाम, उसकी मियाद और घटक आदि क्या हैं। विदेशों में ऐसा ही होता है। भारत में प्राय: 1 गोली, दो गोली खरीदने-बेचने का चलन है। एक आम उपभोक्ता को इससे बचना चाहिए। डॉक्टरों को बड़े अक्षरों में दवा लिखने के निर्देश हैं पर इनका अनुपालन शायद ही कोई डॉक्टर करता हो। जैसा कि कहा गया है, ज्ञान ही शक्ति है, बाजारवाद के दौर में उपभोक्ता की सजगता, सतर्कता ही उसकी शक्ति है। उसे अपने अधिकारों के प्रति हमेशा जागरूक व सजग रहना चाहिए।
’आशीष कुमार, उन्नाव, उत्तर प्रदेश

किसानों के साथ
कृषि और किसान कल्याण को लेकर जब हम ठोस रणनीति की बात करते हैं तो उसमें सबसे पहले 86 प्रतिशत लघु और सीमांत किसानों की बात आती है जो लगातार हाशिये पर जा रहे हैं। यदि भारतीय परिदृश्य में कृषि और किसानों का कल्याण सुनिश्चित करना है तो इन्हीं 86 प्रतिशत किसानों को ध्यान में रख कर रणनीति और कार्ययोजना तैयार करनी होगी तभी जमीन पर कुछ अनुकूलपरिणाम मिल सकते हैं। इस दिशा में सबसे पहले बीज वितरण प्रणाली, सिंचाई सुविधा, वित्तीय सहायता, बाजार व्यवस्था, भंडारण सुविधा जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों को लघु एवं सीमांत जोत को ध्यान में रख कर नीति बनानी होगी। ऐसा इसलिए कि सक्षम किसान तो आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था खुद कर सकते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में कमजोर और संसाधन विहीन किसान पीछे छूट जाते हैं। इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए सबसे पहले परंपरागत कृषि उत्पादन की जगह नगदी फसलों को बढ़ावा देना होगा। फसल की प्राथमिकता तैयार करते समय देश-दुनिया की जरूरतों के साथ मौजूदा परिस्थितियों में उत्पादन क्षमता पर भी ध्यान केंद्रित करते हुए कार्ययोजना आगे बढ़ानी होगी। कृषि उत्पाद खरीद व्यवस्था को सशक्त और प्रभावी बनाना होगा जो किसानों के हितों का पूरा खयाल रख सके।

इस क्षेत्र में निजी व्यवस्था के तहत सरकारी हस्तक्षेप को प्राथमिकता देनी होगी। सरकार खरीद प्रक्रिया में सीधे भाग न लेकर ढांचागत व्यवस्था को सशक्त बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकती है ताकि किसानों के साथ भेदभाव की कोई गुंजाइश न हो। लह इस खरीद प्रक्रिया में भाग लेने वाली संबंधित इकाई को नुकसान होने पर सरकारी कोष से मदद भी मुहैया करा सकती है। चूंकि कृषि व्यवस्था का स्वरूप देश में विकेंद्रीकृत और विविधता से भरा हुआ है, इसलिए क्षेत्रीय विशेषता को ध्यान में रख कर नियमन प्रक्रिया में लचीलापन लाया जा सकता है। इन तमाम प्रयासों के केंद्र में इस बात का हमेशा खयाल रखा जाना चाहिए कि किसानों का किसी भी स्तर पर शोषण न हो।
’सुमित कुमार, गोविंद फंदह, रीगा, सीतामढ़ी

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