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अवमानना की आड़

भारत का चुनाव आयोग दुनिया के तमाम देशों के लिए आदर्श रहा है। चुनाव आयोग के पास यह रास्ता तो है ही कि अपनी अवमानना करने वालों के खिलाफ अदालत के दरवाजे पर दस्तक दे सकता है, फिर वह पाकिस्तान जैसा क्यों बनना चाह रहा है।

Author July 31, 2017 5:20 AM
भारतीय चुनाव आयोग

अवमानना की आड़
हाल ही में चुनाव आयोग ने विधि मंत्रालय को चिट्ठी लिख कर कहा है कि नियमों में संशोधन करके उसे यह अधिकार दिया जाए कि वह अपनी अवमानना करने वालों के खिलाफ खुद ही कार्रवाई कर सके। इसके लिए उसने पाकिस्तान के चुनाव आयोग का उदाहरण दिया है, जिसके पास ऐसा अधिकार है। गौरतलब है कि पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद से कुछ जगह चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं और यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।

भारत का चुनाव आयोग दुनिया के तमाम देशों के लिए आदर्श रहा है। चुनाव आयोग के पास यह रास्ता तो है ही कि अपनी अवमानना करने वालों के खिलाफ अदालत के दरवाजे पर दस्तक दे सकता है, फिर वह पाकिस्तान जैसा क्यों बनना चाह रहा है, जहां कभी लोकतंत्र ठीक से स्थापित ही नहीं हुआ? जनता नए प्रकार की आधुनिक सामंती संस्था से परेशान है। एक ताकत जनता के पास है वोट का अधिकार। फिर तो पांच साल झेलना ही है! आखिर ‘राइट टु रिकॉल’ की बात क्यों नहीं हो रही है? अगर चुनाव में कोई गड़बड़ी हो तो क्यों न सवाल उठाए जाएं? आप पूर्ण तैयारी करते नहीं और सवाल उठने पर छवि खराब होने का रोना रोते हैं! इसके लिए कौन जिम्मेदार है? जनता वैसे ही सांसदों के विशेषाधिकार और अदालत के अवमानना के अधिकार से परेशान है।

सवाल यह भी है कि लोकतंत्र में अवमानना के अधिकार और विशेषाधिकार का क्या औचित्य है? क्या लोकतंत्र में सवाल उठाना छवि खराब करना है? ऐसे तो तानाशाही परंपरा के विकसित होने में देर नहीं लगेगी। देश में संविधान के अनुसार एक ही सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था की गई है। चुनाव आयोग न्यायालय नहीं है। अवमानना का मामला चलाए जाने का अधिकार न्यायालय को प्राप्त है। जिस मतपत्र पर मतदाता का हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान नहीं, उसका क्या भरोसा? चुनाव आयोग ने मतपत्र पर मतदाता के हस्ताक्षर की कायम व्यवस्था को समाप्त कर खुद विवादों को जन्म दिया है। अवमानना का अधिकार दिए जाने से निरंकुशता का जन्म होने का भय बना रहेगा, जो लोकतंत्र के लिए घातक होगा।
’देवेंद्रराज सुथार, जेनवीयू, जोधपुर
सुशासन ऊपर
बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर नीतीश कुमार ने साबित कर दिया है कि वे भ्रष्टाचार के विरुद्ध असली लड़ाई लड़ रहे हैं। दरअसल, तेजस्वी यादव पर इतने गंभीर आरोप हैं कि नीतीश के लिए सरकार चला पाना संभव नहीं था। हालांकि सभी विरोधी दल धर्मनिरपेक्ष होने के नाम पर भ्रष्टाचार का बचाव करते नजर आ रहे हैं लेकिन नीतीश कुमार ने इन सबकी परवाह न करते हुए दिखा दिया कि उनके लिए सुशासन सबसे ऊपर है। आशा है, बाकी नेता भी इससे कुछ सीख अवश्य लेंगे।
’बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

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