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कानून की किरकिरी, ट्रंप की चूक

इससे पहले भी देश के विभिन्न कॉलेजों में यह स्थिति पैदा हो चुकी है। रामजस कॉलेज हो या जेएनयू, सब जगह छात्र देशद्रोह का दंश सह चुके हैं और न्यायिक जांच के बाद बरी भी हुए हैं।
Author April 17, 2017 01:21 am
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

कानून की किरकिरी
किसी आंदोलन को दबाना हो या अपने विरोध में उठ रही आवाजों का गला घोंटना हो तो ‘देशद्रोह’ का मुकदम़ा दर्ज करना इन दिनों सबसे बड़ा हथियार बन गया है। पिछले कुछ समय में ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं। बीते दिनों पंजाब विश्वविद्यालय में भी ऐसा ही हुआ। वहां पाठ्यक्रमों की फीस में अचानक इतनी वृद्धि कर दी गई कि फीस पांच हजार से पचास हजार तक पहुंच गई! इसी मामले में जब छात्रों के संगठन कुलपति से मिलने गए तो उनके समय देने से मना करने पर छात्र उनके कक्ष में घुसने लगे। इसी बात को लेकर छात्रों और पुलिस में गरमागरमी का माहौल बन गया। इसके बाद स्थानीय पुलिस ने छियासठ छात्रों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया। हवाला दिया गया कि कैंपस में देश विरोधी नारे लगे। पुलिस और विश्वविद्यालय की इस मसले पर किरकिरी के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे पुलिस द्वारा लिया गया गलत निर्णय कह कर पल्ला झाड़ लिया।

अब इस मसले पर पुलिस भी बचाव मुद्रा में आ चुकी है। बात महज इन छात्रों की नहीं है। इससे पहले भी देश के विभिन्न कॉलेजों में यह स्थिति पैदा हो चुकी है। रामजस कॉलेज हो या जेएनयू, सब जगह छात्र देशद्रोह का दंश सह चुके हैं और न्यायिक जांच के बाद बरी भी हुए हैं। आजकल सबसे ज्यादा फजीहत देशद्रोह संबंधी कानून की हुई है। पहले बड़े गंभीर मुद्दों पर जहां देश के प्रति साजिश या कोई गतिविधि हो वहां इस कानून का उपयोग होता था, मगर आजकल छिटपुट घटनाओं में इस धारा का प्रयोग करना इस कानून की किरकिरी करवाना है।
’गौरव सागवाल, कौल, कैथल
ट्रंप की चूक
शिया धर्मगुरु अयातुल्ला खुमैनी ने 1979-80 में एक खूनी क्रांति के जरिए ईरान में सत्ता संभाली थी। उनके लोगों ने राजधानी तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया और 444 दिन तक 60 से अधिक अमेरिकियों को बंधक बनाए रखा। तब से आज तक अमेरिका की पश्चिम एशिया नीति शिया-विरोधी और सुन्नी-समर्थक बनी रही है। सुन्नी मुल्कों- सऊदी अरब, पाकिस्तान आदि से अमेरिका के दोस्ताना संबंध रहते हैं, पर शिया देशों- ईरान, सीरिया आदि से उसकी ठनी रहती है। इसी कड़ी में सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद को अपदस्थ करने के लिए पहले बराक ओबामा और अब डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य हस्तक्षेप किया। सीरियाई सेना को इनमें भारी क्षति पहुंची है। अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान अपने अंध शिया-विरोध में यह नहीं समझ रहा कि इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा जैसे सुन्नी उग्रवादी संगठन, जिनकी क्रूर पैशाचिकता करोड़ों लोगों को आतंकित कर चुकी है, असद-विरोधी अभियानों से फायदा उठाकर मजबूत हो रहे हैं। असद को दुर्बल करने का सीधा अर्थ इन्हें शक्तिशाली बना कर मानवता को भयभीत करना है। ट्रंप, जो पहले असद-समर्थक माने जाते थे, ने असद सरकार पर रासायनिक हथियारों के प्रयोग का आरोप लगाकर अपनी नीति पलटी है। उन्हें याद होना चाहिए कि 2013 में इसी प्रकार का आरोप बराक ओबामा ने लगा कर सीरिया पर हवाई हमले किए थे। बाद में संयुक्त राष्ट्र केजांच दल ने आरोप झूठे पाए। उसने दो महत्त्वपूर्ण बातें कही थीं। पहली तो यह कि असद ने नहीं, आइएसआइएस ने रासायनिक गैस इस्तेमाल की और दूसरी यह कि असद सरकार के पास रासायनिक शस्त्र हैं ही नहीं। अब ट्रंप ओबामा का ही खेल खेलते प्रतीत होते हैं।
लेकिन इसके द्वारा वे अपनी विश्वसनीयता के साथ-साथ विश्व के दर्जनों राष्ट्रों सहित खुद अमेरिका की सुरक्षा भी दांव पर लगा रहे हैं। उन्हें समझना चाहिए कि दुनिया भर का वामपंथी प्रचार तंत्र इस काम में जुटा है कि विशेष रूप से असद सरकार और सामान्य रूप से सभी शिया सरकारों को बदनाम किया जाए। ट्रंप को रूस के व्लादिमीर पुतिन से इस विषय पर कुछ सीख लेनी चाहिए।
’अजय मित्तल, मेरठ

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