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विकास का छल

वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है मगर भारतीय विकास के प्रतिमान समझ से परे हैं।

Author June 7, 2017 6:22 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (फाइल फोटो)

विकास का छल

वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है मगर भारतीय विकास के प्रतिमान समझ से परे हैं। यहां आर्थिक समानता व सुरक्षा की आए दिन धज्जियां उड़ाई जाती हैं और सरकार तमाशाबीन बनी देखती है। राजनेताओं की कंमेट्री विकास के बजाय एक-दूसरे के विरुद्ध छींटाकशी पर केंद्रित रहती है। आज भी भारत आर्थिक गुलामी को झेल रहा है। विकसित देश और वहां की बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय समाज के विकास को परे रख कर अपना उल्लू सीधा करने में लगी हैं अर्थात भारत उनके लिए केवल एक उभरता हुआ बाजार है।

खेती की लागत भी न मिलने पर जहां एक तरफ किसान अपनी कृषि उपज का तिरस्कार करने पर मजबूर हैं तो दूसरी तरफ सेवा क्षेत्र में बिना कोई कारण बताए बड़ी संख्या में कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। नतीजतन, बेरोजगारी के इस दौर में जीवन निर्वाह एक बड़ी चुनौती बन गया है। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए भी लोग दर-दर की ठोकरें खाने पर विवश हैं। देश की असल तस्वीर से मुंह मोड़ कर विकास का दम भरने वाले नेताओं को तो अपनी झोली भरने से ही फुर्सत नहीं है। इस सबके बीच आज संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों के औचित्य पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है। नौबत यहां तक आ गई है कि एक इंसान शोषण के इस चक्र से चाह कर भी नहीं निकल सकता।

सरकार का रोजगार के नाम पर मजाक असहनीय हो चला है जबकि आये दिन रोजगार मुहैया कराने की घोषणाएं होती रहती हैं। आखिर यह किस प्रकार का आर्थिक विकास है जो एक इंसान को दो जून की रोटी भी मुहैया नहीं करा सकता? सच तो यह है कि भारतीय समाज का विकास मॉडल फेल हो चुका है और इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
शिक्षा भी आज एक छलावा है। अच्छी शिक्षा हो या अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं, इन्हें वही हासिल कर सकता है जिसके पास पैसा है और बेरोजगारी का यह दंश हमें हमारी मूलभूत आवश्यकताओं से, हमारे उज्ज्वल भविष्य से दूर कर देता है। आज धर्म आधारित राजनीति की जगह कर्म आधारित राजनीति की आवश्यकता है।
’प्रियंका श्रीवास्तव, लखनऊ

पहले आप
कहीं पढ़ा था कि अपराधी या चोर कभी यह नहीं मानता कि उसने चोरी या अपराध किया है। वह तो हमेशा यही कहता फिरता है कि मुझे नाहक फंसाया जा रहा है, प्रतिशोध लिया जा रहा है, प्रताड़ित किया जा रहा है आदि-आदि। अपराधी यह भी कहता है कि ‘औरों को क्यों नहीं पकड़ते, मुझे ही क्यों?’ ऐसा कह कर वह अपने अपराध-बोध के भार को हल्का करना चाहता है। मगर वह नहीं जानता कि ऐसा कहने से उसका अपराध कम नहीं हो जाता। औरों को भी पकड़ा जाएगा, पहले आप तो दुरुस्त हो जाएं! फिर आपकी मिसाल देकर औरों को पकड़ा जाएगा!
अपराधमुक्त समाज का निर्माण करने के लिए अब तुरत-फुरत कार्रवाई करने का समय आ गया है। लंबित कारवाइयों का हश्र हमने देख लिया। समाज में व्याप्त अनियमितताओं, अपराध, धोखाधड़ी, दुराचार को यथा समय और यथा शीघ्र समूल नष्ट करना सरकार का कर्तव्य है। तभी एक आदर्श समाज की सर्जना होगी।
’शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

सलमान खान ने लांच की 25 किलोमीटर प्रति घंटे से चलने वाली साइकिल

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