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स्त्री के प्रति

जिस बंगलुरु में प्रवासी भारतीय दिवस मनाया गया है उसी बंगलुरु में चंद रोज पहले स्त्री के जीवन को सड़क बना दिया गया था।

Author January 12, 2017 4:13 AM
बेंगलुरु में नए साल की संध्या पर हुई छेड़छाड़ की कथित घटना के वीडियो का स्क्रीनशॉट।

जिस बंगलुरु में प्रवासी भारतीय दिवस मनाया गया है उसी बंगलुरु में चंद रोज पहले स्त्री के जीवन को सड़क बना दिया गया था। अमूमन यही स्थिति हमारे समाज की बनी है। जब कोई घटना घट जाए तो उसके बाद एक भव्य कार्यक्रम कर दो और उस घटना को दफना दो! न कोई विचार, न कोई विमर्श और न कोई संवेदनशील कदम! और घटनाएं तो घटती ही रहती हैं क्योंकि वे घटने के लिए ही होती हैं। जब शक्कर पड़ी है तो मक्खियां आएंगी ही! यह हमारे सामाजिक मन का परिणाम है। स्त्री मतलब शक्कर और पुरुष मतलब मक्खी! जब मानव की सोच शक्कर और मक्खी पर जा पड़ती है तो स्त्री स्वतंत्रता, स्त्री अधिकार और स्त्रियों को जीवन जीने का अधिकार क्यों देना चाहे!

इधर दिल्ली में पुस्तक मेला चल रहा है। स्त्री विमर्श पर अनेक किताबें आए दिन प्रकाशित हो रही हैं और लिखने वालियों से लिखने वालों की संख्या अत्यधिक है। अर्थात स्त्री विमर्श भी पुरुष विमर्श के मन पर ही तय होता है। लेखिकाओं का लेखन तो नजर आ रहा है लेकिन उस लेखनी के मूल को नई दृष्टि मिलती नहीं दिख रही। स्त्री लिख रही है लेकिन उसका पाठक पुरुष है और पुरुष जब उस लेखनी की आलोचना लिखता है तो स्त्री की लेखनी में सिर्फ और सिर्फ उसे संकुचित विचार नजर आता है। नतीजतन, स्त्री लेखन अपने मूल को स्त्री तक नहीं पहुंचा पाता जिसकी आवश्यकता स्त्री को है। स्त्री लेखन के लिए स्त्री पाठकों की कमी भी खलती है।

पत्रकारिता के सैद्धांतिक पक्ष ने भी स्त्री विमर्श को एक ‘टीआरपी’ का ही माध्यम बना कर छोड़ दिया है। स्त्री जब सड़क से सरकार और सरकार से साहित्य की तरफ बढ़ती है तो पीछे से एक डरावना चेहरा लिए समाज आ जाता है और बंगलुरु जैसी घटना बना डालता है। जब स्त्री सरकार से अपने अधिकार की बात करती है तो उसे सरकार के उन निर्वाचित लोगों से मुकाबला करना पड़ता है, जिन्हें स्त्री शक्कर के समान लगती है। साहित्य जब स्त्री विमर्श पर लिखा जाता है तो उसमें स्त्रियों की तरफ से पुरुष आलोचक खड़े हो जाते हैं जिन्हें अपने पर कम और स्त्रियों पर विमर्श करने में अधिक मजा आता है।स्त्री विमर्श जब तक स्त्री के लिए और स्त्री स्वतंत्रता के अधिकार से युक्त नहीं होगा तब तक वह सिर्फ और सिर्फ पुरुषों के लिए किसी मजाक से कम नहीं होगा। स्त्री विमर्श के केंद्र में स्त्री पाठक का होना भी जरूरी है जो स्त्री विमर्श के लिए समाज में आवश्यक बदलाव लाए।
’हर्षिक कुमार, भारतीय विधाभवन, दिल्ली

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