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तिल का ताड़

क्या प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद देश में गाय के नाम पर हो रहा नरसंहार बंद हो जाएगा?
Author July 5, 2017 04:16 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

हाल ही में साबरमती आश्रम के सौ साल पूरे होने पर आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में बढ़ रही गो-हिंसा को लेकर कहा है- ‘हमें गोभक्ति का पाठ गांधी से सीखना चाहिए! गोरक्षा के नाम पर हिंसा ठीक नहीं, गोभक्ति के नाम पर लोगों की हत्या स्वीकार नहीं की जाएगी!’ लेकिन क्या प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद देश में गाय के नाम पर हो रहा नरसंहार बंद हो जाएगा? दरअसल, जिन गांधी का जिक्र प्रधानमंत्री ने अपने बयान में किया उन्हीं गांधी का कहना था-‘मेरे लिए गाय पूज्य है, लेकिन मैं उसके लिए किसी मुसलिम को मारने की हद तक किसी भी स्थिति में नहीं जा सकता!’

बेशक, गोहत्या के नाम पर भीड़ द्वारा हिंसा या हत्या करना गलत है। ऐसा करने वाले लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए और पीड़ितों के परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए। 2009 से अब तक गोकशी संबंधी हिंसक घटनाओं में 28 जानें गर्इं हैं, इनमें कुछ घटनाएं संदेह के घेरे में हैं कि क्या हिंसा की वजह गोकशी थी या कोई और रंजिश, झगड़ा आदि। यहां से मीडिया, वामपंथियों और राजनीतिक मौके ढूंढ़ रहे लोगों का गलत काम शुरू होता है। 135 करोड़ लोगों के देश में आठ वर्षों में 28 मौतें होने पर हिंसा, मानवाधिकार में हमसे कई गुना अधिक आपराधिक रिकॉर्ड वाले देश भी हमारा मजाक बनाने लगे। ऐसे-ऐसे देश जिनके एक छोटे प्रांत की हिंसा अनुपात में भारत की चौगुनी हो, इस बिनाह पर ‘हिंदू आतंकवाद’ के जुमले उछाल रहे हैं। जहां दुनिया भर में हजारों-लाखों लोग मर रहे हैं वहां अगर इतनी मौतों पर कोई धर्म ‘आतंकवाद’ को पोषित करने वाला ठहराया जाने लगे तो दुनिया भर के आतंकवाद के मापदंड से हिंदू आतंकवादी सबसे टुच्चे आतंकवादी ह

गाय पर थोक के भाव कार्यक्रम बन रहे हैं, स्टैंडअप कॉमिक, डाक्यूमेंट्री के साथ ही देसी-विदेशी मीडिया भारत को ‘लिंचीस्तान’ बता रहे हैं। ‘सलेक्टिव जर्नलिज्म’ से जो माहौल बनाने की कोशिश है उसमें बात इतनी बार दोहराई जा रही है कि बिना कुछ किए लोग अपराधबोध महसूस कर रहे हैं। हिंसक अपराधों में भारत दुनिया के पहले सत्तर देशों में नहीं है पर देश-विदेश में सबकी सूची में भारत दुनिया का नर्क है और हर गलत बात में सबसे आगे! क्या इसे भारत का सच कहा जा सकता है? अंतरराष्ट्रीय मंचों, योजनाओं, निवेश और पर्यटन पर इस झूठी छवि के असर से भारत में करोड़ों लोगों के रोजगार पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। क्या अनुपात से हजार गुना अधिक हल्ला मचा कर, फुटेज देकर करोड़ों परिवारों की रोजी-रोटी पर असर डालना पाप नहीं? तिल का ताड़ न बनाने की गुजारिश के साथ मैं चाहता हूं कि गोहत्या या ऐसे किसी मुद्दे पर किसी की जान न जाए, 28 नहीं शून्य हो यह संख्या!
’देवेंद्रराज सुथार, जेएनवीयू, जोधपुर
फसाद की जड़
सांप्रदायिकता किसी भी समाज के लिए अंतत: एक जहर साबित होती है। इस जहर को समाप्त करने के लिए जरूरी है सभी संप्रदायों से जुड़े लोग एकजुट होकर इसका विरोध करें। इस विरोध के लिए पहली शर्त यह है कि हम ऐसे सभी संगठनों का पुरजोर विरोध करें जो हमारे धर्म/ मजहब/ पंथ की हिफाजत के बहाने कुछ लोगों ने बनाए हैं और जो समाज को जोड़ने के बजाय उसे तोड़ने में दिलचस्पी रखते हैं। देखा यह गया है कि हम अपने घर को दुरुस्त करने के बजाय, दूसरे के घर की कमियां गिनने लगते हैं। कई लोग तो अपने उन्मादी संगठनों के खिलाफ बोलने के बजाय उनकी पीठ ठोकते रहते हैं।
हमारा यह संकुचित दृष्टिकोण सांप्रदायिकता के खिलाफ हमारे संघर्ष को कमजोर करता है। अनुभव यही बताता है कि यह पक्षपात ही सारे फसाद की जड़ है।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

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