jansatta chaupal about controversy of anil vij statement - Jansatta
ताज़ा खबर
 

विवाद का शौक

पिछले साल खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर पर गांधीजी को उनके चरखे से हटा कर मोदीजी को सुशोभित किया जाना आम देशवासियों को उचित नहीं लगा था।

Author November 23, 2017 5:20 AM
हरियाणा के स्‍वास्‍थ्‍य और खेल मंत्री अनिल विज

ऐसा लगता है कि हरियाणा के एक मंत्री अनिल विज को जब-तब कोई न कोई विवाद खड़ा करने का कुछ ज्यादा ही शौक है। अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा जब राम रहीम के मामले में वे मीडिया में काफी चर्चित होने का गौरव हासिल कर चुके हैं। दुख की बात यह है कि भाजपा के इन मंत्री महोदय के गुस्से का शिकार अक्सर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी होते हैं। पिछले साल खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर पर गांधीजी को उनके चरखे से हटा कर मोदीजी को सुशोभित किया जाना आम देशवासियों को उचित नहीं लगा था। तब अनिल विज जी ने इसे न्यायसंगत ठहराया। यहां तक भी टिप्पणी की कि कल को करेंसी नोटों पर भी गांधीजी की जगह मोदीजी की छवि दिखाई जा सकती है!

अब कवि प्रदीप के गीत ‘साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ को लेकर इन्होंने न केवल स्वाधीनता आंदोलन की मूल शक्ति रहे महात्मा गांधी का अपमान किया है, बल्कि दिवंगत प्रदीप जैसे संवेदनशील कवि को भी कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है। ‘दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल’ से कवि का आशय बापू के अहिंसा के आदर्श को प्रतिष्ठित करना है, न कि देश को स्वतंत्र कराने में भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद जैसे देश के वीर सपूतों के योगदान की अनदेखी करना। अनिज विज जी को सोचना चाहिए कि ‘ऐ मेरे वतन के लोगों…’ जैसे अमर गीत के रचनाकार भी वही कवि प्रदीप हैं। ‘जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी’ जैसे बोलों द्वारा जिन्होंने सेना के वीर जवानों को भावभीनी श्रद्धांजलि दी है।
’शोभना विज, पटियाला

कानून के तकाजे
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराए जाने के बाद अब सरकार इसके लिए कानून लाने जा रही है। लेकिन सरकार को कानून तैयार करते हुए इस बात का भी खयाल रखना होगा कि इससे मुसलिम समाज की महिलाओं के लिए कोई और मुश्किल न खड़ी हो जाए, क्योंकि कुछ इंसानियत के दुश्मन लोग कानूनों का भी कोई न कोई तोड़ निकाल लेते हैं।
यों सरकारों और न्यायालयों को किसी भी धर्म के रीति-रिवाज या परंपराओं में न्यूनतम हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन जिन रीति-रिवाजों और परंपराओं से मानवता का हनन होता हो, उन्हें कानून के दायरे में लाना चाहिए, ताकि शोषण पर आधारति सभी कुप्रथाओं पर प्रतिबंध लगाया जा सके। सिर्फ तीन तालाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही बेवजह के तलाक देने के मामले नहीं रुकने वाले। दहेज विरोधी कानून होने के बावजूद दहेज प्रथा के मामले कहां खत्म हुए हैं?
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

सुविधा के विरोध
हमारे देश में किसी भी फिल्म को देखे बिना ही उस पर बवाल मच जाता है। लेकिन कोई भी अश्लील गीतों की ओर ध्यान नहीं देता। अश्लील शब्दों से भरे हुए जो वीडियो बनाए जाते हैं, उनमें संस्कृति और धर्म को शर्मसार किया जाता है। लोग फिर भी उन्हें देखते हैं। कोई भी उसका विरोध तक नहीं करता।
’गुरलाल, अबोहर

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App