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चौपाल: सद्भाव की खातिर

पिछले कई वर्षों से गाहे-बगाहे ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती रही हैं- ‘उस गांव में रामलीला करते हैं मुसलमान।

रामलीला (फाइल फोटो-इंडियन एक्सप्रेस अमित मेहरा)

पिछले कई वर्षों से गाहे-बगाहे ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती रही हैं- ‘उस गांव में रामलीला करते हैं मुसलमान।’ या ‘इस मोहल्ले के हिंदू मनाते हैं ईद।’ हो सकता है, कुछ लोग सोचते हों कि ऐसे समाचारों से सामाजिक समरसता और दो संप्रदायों के बीच में आपसी सद्भाव बढ़ेगा लेकिन यह उनकी भूल है। सामाजिक सद्भाव बढ़ाने के लिए हिंदू का मुसलिम त्योहार मनाना या मुसलमानों का हिंदू त्योहार मनाना कतई गैर जरूरी है। अगर कोई मनाता है तो यह उसकी मर्जी है लेकिन इसे समाचार बनाने की जरूरत नहीं।

हिंदू और मुसलमानों में भाईचारा और सद्भाव बढ़ाने के लिए सबसे अधिक जरूरी है एक हिंदू का सच्चा हिंदू होना और एक मुसलमान का सच्चा मुसलमान होना। ऐसा इसलिए कि एक सच्चा हिंदू ‘वसुधैव कुटुंबकम’ में विश्वास करता है तो एक सच्चा मुसलमान ‘मुसल्लम ईमान वाला’ होता है। जहां तक रीति-रिवाजों और तीज-त्योहारों अथवा टोपी-तिलक का सवाल है, इनका इस्तेमाल नेता करते हैं लोगों को भरमाने के लिए। आम इंसान तो यही चाहता है- सबको रोजी-रोटी मिले और सुख-दुख में सब मेलजोल से रहें। कोई भी एक-दूसरे के रहन-सहन और खानपान को लेकर फिजूल की बातें न करे। जरूरत पड़ने पर सब मिल कर देश के दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए तैयार रहें। नौटंकी से कभी किसी कौम या देश का भला नहीं होता।
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

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