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एकसमान शिक्षा नहीं तो प्रतियोगी परीक्षाओं में एकसमान प्रश्न पूछना कितना वाजिब है?

हमारी शिक्षा प्रणाली इसके लिए उत्तरदायी है, जिसमें किताबी ज्ञान पर ही जोर दिया जाता है और आज के युग में उद्योगों में जरूरी हुनर, कला-कौशल, योग्यताएं और प्रतिभाएं विकसित नहीं की जातीं।

Author July 24, 2017 5:11 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर (Source: Agency)

शिक्षा का उद्देश्य

पिछले दिनों सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधार लाने के उद््देश्य से राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिए देश के जानेमाने वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय समिति गठित की है। यह समिति दो वर्ष पूर्व गठित सुब्रमण्यन समिति के सुझावों का भी इस्तेमाल करेगी। नई शिक्षा नीति में मौजूदा शिक्षा नीति की विसंगतियों को दूर किया जाना चाहिए। वर्तमान शिक्षा नीति की सबसे बड़ी खामी तो यह है कि देश में एकसमान शिक्षा प्रणाली नहीं है। समानता और समता का माध्यम बनने वाली शिक्षा विषमता की डगर पर चल रही है। पब्लिक स्कूलों की तुलना में सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों को न एकसमान पाठ्यक्रम मयस्सर हैं, न एकसमान सुविधा, लेकिन कॉलेजों में दाखिले के लिए उन्हीं विद्यार्थियों से उन्हें प्रतियोगिता करनी पड़ती है। दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी दोनों को एकसमान प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। जब एकसमान शिक्षा नहीं दी गई तो प्रतियोगी परीक्षाओं में दोनों से एकसमान प्रश्न पूछना कितना वाजिब है?

नई शिक्षा नीति तैयार करते समय इन सवालों के जवाब तलाशे जाने चाहिए कि क्या वर्तमान पाठ्यक्रम छात्रों की रुचि और उनके चहुंमुखी विकास के अनुरूप है? क्या शिक्षा को कोचिंग के हवाले करना सही है? शिक्षा को रोजगारोन्मुखी नहीं बनाया जा सका है। हमारी शिक्षा प्रणाली इसके लिए उत्तरदायी है, जिसमें किताबी ज्ञान पर ही जोर दिया जाता है और आज के युग में उद्योगों में जरूरी हुनर, कला-कौशल, योग्यताएं और प्रतिभाएं विकसित नहीं की जातीं।नई शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करते समय तकनीकी तथा रोजगारपरक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाए ताकि शिक्षा नैतिक मूल्यों के विकास के साथ-साथ रोजी-रोटी में भी मददगार सिद्ध हो। इसके लिए स्कूलों में ही कौशल प्रशिक्षण के जरिए माध्यमिक शिक्षा को रोजगार परक बनाया जाना चाहिए। तकनीकी कौशल रखने वाले प्रशिक्षकों की नियुक्ति माध्यमिक स्कूलों में होनी चाहिए। दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों में हाइस्कूल के तीस-चालीस प्रतिशत छात्र व्यावसायिक शिक्षा चुनते हैं, जो उन्हें बारहवीं पूरी करने पर रोजगार के लिए तैयार कर देती है।

आज शिक्षा के विविधीकरण पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। हमें छात्रों को ऐसी शिक्षा देने पर जोर देना होगा जो उनके बहुआयामी तथा बहुस्तरीय नजरिये का विकास कर सके। कहा जाता है कि किसी देश का भविष्य क्या होगा यह वहां की शिक्षा व्यवस्था को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे में आने वाले दशकों में दुनिया के अव्वल देशों में भारत का स्थान बनाने के लिए हमें वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल बदलाव लाना होगा।
’कैलाश मांजु बिश्नोई, मुखर्जीनगर, दिल्ली

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