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चौपाल: हाशिये की आवाज

आज देश को फासीवादी, पूंजीवादी, ब्राह्मणवादी ताकतों से लड़ने और सामाजिक न्याय के पक्ष में आवाज बुलंद करने की जरूरत है।

Author September 20, 2016 11:36 PM
जेएनयू परिसर में प्रदर्शन करते जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार और अन्य छात्र। (Photo Source:PTI)

मैं जनवादी राजनीति में अस्मितामूलक विमर्शों को शामिल करने की बात कह रहा हूं, तो इसके ये मायने कतई नहीं हैं कि मैं जातिवाद की राजनीति का समर्थक हूं। स्वस्थ लोकतंत्र में जातिवाद की राजनीति के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। मगर अस्मितामूलक विमर्शों को जातिवादी राजनीति से जोड़ कर देखना मेरे हिसाब से ऐतिहासिक भूल और घातक है। यह विचार वामपंथी राजनीति करने वालों के लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि कहीं वे ऐसा करके इन विमर्शों के पीछे खड़ी सामाजिक-राजनीतिक वैचारिकी को उस पाले में धकेलने का काम तो नहीं कर रहे, जो गाहे-बगाहे इस फिराक में रहते हैं कि राजनीति में विमर्शों का इस्तेमाल कैसे हो! मैं विमर्शों के राजनीतिक इस्तेमाल के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन विमर्शों का राजनीतिक इस्तेमाल समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए हो तो वह न केवल सामाजिक रूप से देश के लिए लाभदायक है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रणाली को मजबूती प्रदान करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

ऐसी बौद्धिक बहसों में इस तरह के साहित्यिक-सामाजिक विमर्शों को या तो हंसी-ठिठोली में टाल दिया जाता है या फिर एकदम से खारिज कर दिया जाता हैं। लेकिन हम देख ही रहे हैं कि इस नकार के बावजूद दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श आज समाज में भी स्थापित हो रहे हैं और साहित्य में भी। सवाल उठता है कि क्या गरीब, शोषित के पक्ष में राजनीति करने वाली वामपंथी जनवादी राजनीति अस्मितामूलक विमर्शों को इसी तरह नकारती रहेगी या फिर अपनी सोच में बदलाव करके अपने चिंतन में उसे जगह देगी!

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव परिणाम में एक आहट सुनाई पड़ रही है, जो सीधे-सीधे वाम विचारधारा को आगाह कर रही है कि उन्हें अब अपने संकीर्ण दायरों से बाहर निकलना होगा, अन्यथा उनकी जगह अब बहुजन वैचारिकी लेने को आतुर है। हाशिये के विमर्शों को वाम-जनवादी राजनीति के विस्तार के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि इन विमर्शों की वैचारिकी का केंद्रीय स्वर शोषण के खिलाफ आवाज उठाना है और यही स्वर वाम-जनवादी राजनीति का भी है। तो फिर क्यों अस्मितामूलक विमर्शों को जातिवादी कह कर नकारा जा रहा है? वामपंथियों पर यह आरोप लगता रहा है कि वे हाशिये के लोगों को राजनीतिक नेतृत्व नहीं देते। इसका बचाव अक्सर वे यह कह कर देते हैं कि उनके यहां जाति देख कर राजनीति नहीं होती। सवाल उठता है कि वाम राजनीति के शीर्ष नेतृत्व में केवल एक ही जाति के लोग क्यों दिखाई पड़ते हैं? क्या उन्हें दूसरी जातियों में राजनीतिक क्षमता दिखाई नहीं पड़ती?

आज देश को फासीवादी, पूंजीवादी, ब्राह्मणवादी ताकतों से लड़ने और सामाजिक न्याय के पक्ष में आवाज बुलंद करने की जरूरत है। यह तभी संभव है जब आंबेडकरवादी और वामपंथी साझा मंच बना कर देश को कमजोर करने वाली ताकतों के खिलाफ खड़े हों। मेरा मानना है कि वामपंथी जनवादी राजनीति जब तक अपने संकीर्ण दायरों से बाहर आकर अस्मितामूलक राजनीति को अपने विस्तार के रूप में नहीं देखेगी, तब तक न केवल वाम राजनीति का भविष्य अंधेरे में है, बल्कि किसी भी तरह के शोषण के खिलाफ कोई ठोस आवाज नहीं उठेगी।
’पप्पूराम मीना, दयालसिंह कॉलेज, नई दिल्ली

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