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कथनी बनाम करनी

इक्कीस दिनों के भीतर ही लगभग अस्सी प्रतिशत पैसा बैंकों में जमा किया जा चुका है और कालेधन के रूप में कोई भी पैसा सरकार को नहीं मिला है।

Author December 6, 2016 4:09 AM
पुराना पांच सौ का नोट।

भुवनेश्वर में एक कार्यक्रम में केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि पीड़ा, हिंसा और पलायन ये सब जीवन की वास्तविकताएं हैं; सरकार अब अपने इस कदम (नोटबंदी) से पीछे नहीं हटेगी, चाहे परिणाम कुछ भी हों। इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया को लोगों को हो रही परेशानियों से ज्यादा इस कदम की अच्छाइयों को दिखाना चाहिए।
इस बयान से पता चलता है कि सरकार आम लोगों द्वारा झेली जा रही परेशानियों के प्रति कितनी असंवेदनशील हो गई है। पचासी फीसद मुद्रा को एक झटके में अर्थव्यवस्था से हटा देने और जरूरी मुद्रा न छापे जाने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। शहरी क्षेत्रों में मजदूरों को वेतन नहीं मिल रहा है। दिहाड़ी मजदूर खाने को तरस रहे हैं। कर्मचारियों की तनख्वाह भी बैंकों से नहीं निकल रही है। उद्योग-धंधे ठप्प हैं। करीब नब्बे लोग काल के गाल में समा चुके हैं। इनमें वे दो नवजात शिशु भी शामिल हैं, जिन्हें पैसा होने के बाद भी इलाज के लिए अस्पताल में भरती नहीं किया गया। ऐसे में अरुण जेटली का भुवनेश्वर में दिया यह बयान घोर असंवेदनशीलता से ग्रस्त है।

प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के शुरुआती दिनों में कहा था कि किसी भी बेईमान को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन जिस तरह के आंकड़े रिजर्व बैंक ने हाल-फिलहाल में जारी किए हैं, उनसे पता चलता है कि इक्कीस दिनों के भीतर ही लगभग अस्सी प्रतिशत पैसा बैंकों में जमा किया जा चुका है और कालेधन के रूप में कोई भी पैसा सरकार को नहीं मिला है।
एक तरफ सरकार बेईमानों को न बख्शने की बात कहती है और दूसरी तरफ आयकर संशोधन बिल पास करा कर बेईमानों को अपना काला धन पचास प्रतिशत की दर पर सफेद करने का मौका देती है। इसके बाद भी अरुण जेटली का ऐसा बयान देना दर्शाता है कि इस सरकार की दिलचस्पी केवल माल्या जैसे लोगों की कर-माफी में ही है, आम लोगों की दिक्कतों से इनका कोई सरोकार नहीं।
’मुरारी त्रिपाठी, कानपुर

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