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चौपाल: पाबंदी का संबंध

आतंकवाद खत्म करने के लिए दोनों देशों का साथ आना जरूरी है, इसकी वजह से सांस्कृतिक गतिरोध और पाबंदी की परंपरा की शुरुआत कहीं से भी न्यायोचित नहीं लगती।

Author नई दिल्ली | October 5, 2016 4:58 AM
सीमा पर उपजे तनाव का फिल्मों और टीवी चैनलों पर पाबंदी से क्या संबंध है।

उड़ी हमले और फिर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव तो बना ही हुआ है, साथ ही प्रतिबंध लगाने का भी दौर शुरू हो चुका है। इसी सोमवार को सीमा पर हुई गोलीबारी और एक जवान की शहादत के बीच पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक प्राधिकरण (पीईएमआरए) ने सभी भारतीय चैनलों को गैरकानूनी करार देते हुए पंद्रह अक्तूबर से उन्हें ‘बैन’ करने का आदेश जारी किया। ऐसा न करने वाले टीवी चैनलों और डिस्ट्रीब्यूटरों पर सख्त कार्रवाई की बात भी कही गई है। लिहाजा, समझना जरूरी हो जाता है कि सीमा पर उपजे तनाव का फिल्मों और टीवी चैनलों पर पाबंदी से क्या संबंध है।

इसकी शुरुआत दरअसल पाकिस्तान ने की, जब उसने ‘एमएस धोनी’ फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी। जवाब में इंडिया मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (आईएमपीपीए) ने दोनों देशों के बीच हालात स्थिर होने तक पाक कलाकारों और टेक्नीशियनों के भारत में काम करने प्रतिबंध लगाया और अब पाकिस्तान ने यह सिलसिला जारी रखा है।
बेशक ये कदम दोनों देशों के बीच तनाव से उपजे हालात की वजह से उठाए गए हों, लेकिन यहां सबसे जरूरी है कि इस तनाव के मूल कारण आतंकवाद पर रोक की वकालत की जाए। आतंकवाद खत्म करने के लिए दोनों देशों का साथ आना जरूरी है, इसकी वजह से सांस्कृतिक गतिरोध और पाबंदी की परंपरा की शुरुआत कहीं से भी न्यायोचित नहीं लगती।
’प्राणेश तिवारी, नई दिल्ली

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