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नक्सली नासूर

छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सलवादियों के घात लगा कर किए गए हमले में सीआरपीएफ के 26 जवानों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

Author April 26, 2017 4:46 AM
छत्तीसगढ़ : नक्सली हमले में एसटीएफ अधिकारी शहीद, जवान घायल

छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सलवादियों के घात लगा कर किए गए हमले में सीआरपीएफ के 26 जवानों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस हमले की जितनी भी निंदा की जाए कम है और मारे गए जवानों के प्रति केवल जुबानी हमदर्दी जताई जाए वह भी कम है। इन परिवारों को पूरा सम्मान और अधिकतम सहायता दी जानी चाहिए। नक्सलवादियों की यह कोई पहली वारदात नहींं है। 2010 में उनके हमले में 62 जवान शहीद हुए थे। हालिया घटना में दो बातें हैं जो अतिरिक्त चिंता का कारण बनती हैं। एक तो नक्सलियों द्वारा हथियारों पर कब्जा और दूसरी, एक घायल जवान का वह बयान जिसमें उसने कहा कि ग्रामीणों द्वारा रेकी की गई जिसके चलते हमला हुआ। सुकमा की घटना में नक्सलियों को ग्रामीणों का सहयोग दो कारणों से मिल सकता है। पहला, या तो नक्सलियों का दबाव और दूसरा, ग्रामीणों में इस सोच का विकास कि नक्सलियों के साथ ही नहींं बल्कि उनके साथ भी तो शासन न्याय नहींं कर रहा। दबाव तक तो ठीक है, उससे शासन निपट सकता है लेकिन ग्रामीणों में पनप रही इस सोच का इलाज किसी के पास नहीं है। जाहिर है, सरकार किसी गांव को तो गोलियों से नहीं उड़ा सकती।

निश्चित रूप से मौजूदा केंद्र सरकार को नक्सली हिंसा या कश्मीरी आतंकवाद के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि ये समस्याएं दशकों पुरानी हैं और मोदी सरकार महज तीन साल पुरानी। पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा गंभीरता से नहीं लिए जाने के कारण यह समस्या आज नासूर बन चुकी है। बेशक वे सरकारें अपनी स्वर्णिम उपलब्धियों का बखान करें जो वास्तव में उन्होंने इस देश को दी हैं लेकिन इन समस्याओं को नासूर बन जाने की हद तक पहुंचने की जिम्मेदारी भी उन्हें अपने सिर लेनी चाहिए। कोई भी समस्या ऐसी नहीं जिसका समाधान न हो। यह आपके तरीके, मानसिकता और संकल्प पर निर्भर करता है कि आप समाधान चाहते हैं अथवा नहीं। कई लोग लिट्टे और भिंडरांवाला का उदाहरण देकर उसी तरीके से इन समस्याओं को भी हल करना चाहते हैं लेकिन उन्हें याद रखना चाहिए कि ये तरीके अंतिम विकल्प के रूप में प्रयोग में लाए गए थे। संवाद और समझाइश से बेहतर कोई रास्ता नहीं हो सकता। इसका परिणाम हम देख चुके हैं। अनेक नक्सली हथियार डाल कर मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं। जरूरत पहले ऐसा माहौल तैयार करने की है जिसमें दूसरा पक्ष खुद को असुरक्षित न समझे और उसे यह एहसास हो जो कि शासन उन्हें न्याय दिलाने के प्रति गंभीर और ईमानदार है।

संवाद समस्या से जुड़े सभी पक्षों के साथ होना चाहिए वरना समाधान संभव नहीं है। साथ ही नक्सलवाद की समस्या को कानून व व्यवस्था से जोड़ कर सामाजिक, आर्थिक और विकास के परिप्रेक्ष्य में भी देखने की आवश्यकता है। तभी इस समस्या से सकारात्मक तरीके से निपटा जा सकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि नक्सलियों को कतिपय विदेशी तत्त्वों का भी सहयोग-समर्थन हासिल है, इससे निजात पाने के लिए दृढ़ राजनीतिक संकल्प की आवश्यकता है। इसके लिए यह भी जरूरी है कि ठोस व तर्कसंगत रणनीति अपनाई जाए, नहींं तो नक्सलवाद का अभिशाप देश को तहस-नहस कर देगा। नक्सलवाद प्रभावित राज्यों की जनता भी नक्सली हिंसा और आतंक झेलने के बावजूद इसके विरुद्ध एकजुट नहींं हो पाई है। देश के अन्य राज्यों के लोग तो इससे उत्पन्न होने वाली त्रासदी से करीब-करीब अनभिज्ञ हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि जब कभी बाहरी खतरे का प्रश्न उभरता है, देश की जनता एकजुट होकर शासन और प्रशासन के साथ उठ खड़ी होती है, लेकिन यह एकजुटता देश को तबाह करने वाली नक्सली हिंसा के विरुद्ध नहींं दिखाई देती।
’देवेंद्रराज सुथार, बागरा, जालोर

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