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हार का ठीकरा

अखिलेश यादव ने भी उन्हीं के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही केजरीवाल, अजय माकन आदि कईअन्य नेताओं ने भी इवीएम मशीनों के खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी है।

Author Published on: March 16, 2017 4:12 AM
ईवीएम की फाइल फोटो। (Source: PIB)

इतनी देर
विधानसभाओं के चुनाव परिणाम ग्यारह मार्च को आने के बाद भी प्रचंड बहुमत वाले राज्यों उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अभी तक विधायक दल का नेता नहीं चुना जा सका है। महीनों से आचार संहिता लगी होने के कारण इन राज्यों में सब काम रुके पड़े हैं। मार्च का महीना है और सारा बजट समाप्त हो जाएगा, इसकी कोई चिंता नहीं है। चुनाव प्रचार के दौरान कहा जा रहा था कि हमारे यहां नेताओं की कमी नहीं है। तो कहां हैं वे नेता? देश में जो भी दल बहुमत पाता है उसके विधायकों को अपना नेता चुनने का अधिकार नहीं होता, इसीलिए इतना समय लगता है।
दरअसल, पहले नेता थोपा जाता है और फिर विधायकों की स्वीकृति ली जाती है। इसका कारण बनता है विधायकों में असंतोष। इसके मद्देनजर चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के समय नेता चुनने की तारीख भी तय होनी चाहिए।
’यश वीर आर्य, देहरादून
हार का ठीकरा
हालिया विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद मायावती ने अपनी हार का ठीकरा इवीएम मशीनों पर फोड़ दिया। उनके बाद अखिलेश यादव ने भी उन्हीं के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही केजरीवाल, अजय माकन आदि कईअन्य नेताओं ने भी इवीएम मशीनों के खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी है। इसे हम चुनावी पराजय के पैदा इन नेताओं की खीझ ही कहेंगे जो अपनी हार को पचा नहीं पा रहे हैं। जो लोग इवीएम मशीनों से छेड़छाड़ की बात कह रहे हैं उनके पास इसे साबित करने का कोई भी सबूत नहीं है। अगर इन मशीनों में हेरफेर करके मनचाहे परिणाम निकालना संभव होता तो भला पंजाब, गोवा और मणिपुर में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे नतीजे क्यों नहीं आए?
जनता को गुमराह करके वे अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। जब भी मतदान शुरू होता है उससे पहले हर पार्टी के पोलिंग एजेंट स्वयं उसे परखते हैं और उससे संबंधित सूचना अपने नेता को देते हैं ताकि किसी भी गड़बड़ी का अंदाजा शुरुआती दौर में ही लग सके। इसी के साथ मतदान खत्म होने पर भी यही प्रक्रिया दोहराई जाती है। जब इवीएम मशीन बूथ पर पहुंचती है तो किसी को पता भी नहीं होता कि कौन-सी सीरीज की मशीन उस मतदान केंद्र पर आई है। साथ ही ये मशीनें किसी भी प्रकार इंटरनेट से भी नहीं जुड़ी होती हैं, लिहाजा यह बहुत मुश्किल है कि इसमें किसी भी प्रकार की हेरफेर की जा सके। उत्तर प्रदेश में तीन लाख से भी अधिक इवीएम मशीनों का प्रयोग किया गया, ऐसे में यह लगभग नामुमकिन-सी बात है। जनता बेवकूफ नहीं है। चुनाव में हार हुई है तो इसका ठीकरा इवीएम मशीन या किसी और पर न फोड़ें। अपनी कारगुजारियों का एक बार अवलोकन कर लें, जवाब खुद मिल जाएगा।
’शिल्पा जैन सुराणा, वरंगल, तेलंगाना

 

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