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चौपाल: कैसी खुशियां

सरकार आज मुकेश अंबानी की सफलता का जश्न मना रही है लेकिन उसने कभी भारतीय संचार माध्यमों के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाया गया।

Author नई दिल्ली | September 8, 2016 2:13 AM
जियो लॉन्च करते मुकेश अंबानी।

चारों तरफ खुशियां मनाई जा रही हैं। दुनिया को मुट्ठी में करने की चाहत लिए युवाओं से लेकर बड़े बुजुर्ग सभी ‘जिओ’ की दुकानों की तरफ भाग रहे हैं। मुझे याद है, एक समय भारत संचार निगम लिमिटेड के ‘सिम’ के लिए भी लोग इसी तरह मशक्कत करते थे। वह समय संचार क्रांति की शुरुआत का था और आज ‘जिओ’ की दौड़ में डाटा क्रांति की शुरुआत का। समय बलवान होता है। तब लोगों को सरकारी उपक्रम पर विश्वास होता था, आज सरकारी नौकरी तो अच्छी लगती है मगर सेवाएं नहीं। कभी भारत संचार निगम लिमिटेड देश को जोड़ने की बात करता था। अब देश का हर व्यक्ति उपभोक्ता है और प्रत्येक वह व्यक्ति जो कुछ बेचने की क्षमता रखता है, व्यापारी है। अब सब काम नफा-नुकसान पर टिके हैं। शायद यही कारण है कि मतदाता अपना वोट बेच रहे हैं और नेता लोगों की भावनाओं को भुना सत्ता पर काबिज हो रहे हैं। यही है इक्कीसवीं सदी का उन्नत भारत!

मुफ्त डाटा की खुशियों के साथ मातम मनाने की भी संभावनाएं प्रबल हैं। मुफ्त डाटा की धार से सबसे पहले संचार क्षेत्र में काम कर रहे सरकारी कर्मी का गला रेता जाएगा यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है। आज भले मुफ्त बात करने और सबसे तेज इंटरनेट की सुविधा का दंभ रिलायंस द्वारा भरा जाए, भले ही इसका ब्रांड एंबेसडर प्रधानमंत्री को बनाया जाए, लेकिन जब 2-जी की दौड़ थी तब भी सरकार के संचार माध्यम का कोई जबाव नहीं था। वीडियो कॉलिंग से लेकर सभी जगह उसके नेटवर्क की बेहतरीन सुविधा उपलब्ध थी। सरकारी संचार माध्यमों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उपभोक्ताओं के साथ छलावा नहीं किया जाता है। लेकिन भारत संचार निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों के अलावा सरकार के मंत्रियों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी इसे सबसे फ्लॉप सेवा की कंपनी बनाने में। कॉल ड्रॉप और लोगों की परेशानियों को सुलझाने के बदले उनसे कन्नी काटने की प्रवृत्तियों के कारण धीरे-धीरे लोगों ने इससे तौबा कर ली। सरकार निजी कंपनियों को रोजगार फैलाने के लिए प्रोत्साहित करती रही और सरकार की अपनी कंपनी के अधिकारी और मंत्री हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। इसी का नतीजा है कि आज कई कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं जबकि सरकारी संचार कंपनियों से सरकारी मिशनरी भी हाथ समेटते नजर आ रहे हैं। क्या कारण है कि आज भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) की जगह लोग ‘‘भाई साहब नहीं लगेगा’’ के तंज कसने लगे हैं।

सरकार आज मुकेश अंबानी की सफलता का जश्न मना रही है लेकिन उसने कभी भारतीय संचार माध्यमों के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाया गया। बार-बार पढ़ने-सुनने को मिलता है कि कई मंत्रियों और अधिकारियों के यहां टेलीफोन का बिल बकाया है। प्रतिस्पर्धा के दौर में सरकारी कर्मियों की आरामतलबी और भ्रष्टाचार ने सरकार के इस उपक्रम को हाशिये पर ला खड़ा किया है। यह एक साजिश है तमाम सरकारी संसाधनों से सरकार का नियंत्रण समाप्त करने की। उदारीकरण और खुले बाजार के नाम पर देश में ठेकेदारी व्यवस्था और निजी कंपनियों का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। यह शुरुआती दौर है। लेकिन जब इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बाजार पर एकाधिकार होगा, तब तय मानिए कि उपभोक्ताओं का शोषण होगा और परेशान उपभोक्ता लाचार और बेबस नजर आएंगे।
’अशोक कुमार, तेघड़ा, बेगूसराय

 

 

 

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