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ऐसे महामहिम, अफसर से उम्मीद

भावी राष्ट्रपति को लेकर विचार-विमर्श प्रारंभ हो चुका है। कुछ नाम उछाले भी गए हैं।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

ऐसे महामहिम
भावी राष्ट्रपति को लेकर विचार-विमर्श प्रारंभ हो चुका है। कुछ नाम उछाले भी गए हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि शीघ्र ही इस संबंध में कोई चौंकाने वाली खबर आ जाए, जैसापिछली से पिछली बार हुआ था। इस वक्त देश की जैसी परिस्थितियां हैं, उनमें यह सोचना गलत नहीं होगा कि भावी राष्ट्रपति दृढ़-संकल्पी, बेदाग और निष्पक्ष गति-मति वाला व्यक्तिहोना चाहिए। गरीबों का हमदर्द, किसानों का हितैषी, बेरोजगारों और बेबसों की कठिनाइयां जानने-समझने वाला, जो पद की सुख-सुविधा का भोग तो करे, मगर अभावग्रस्त आम जनता का दुख-दर्द भी समझे। जो भ्रष्टाचार और अपसंस्कृति मुक्त समाज और देश की परिकल्पना को साकार करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाए। जो आर्थिक, कूटनीतिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि सुधारने में अपने विवेक का बिना किसी दबाव के इस्तेमाल करे। महामहिम होने के नाते देश की समस्याओं को दूर से नहीं निकट से आत्मसात कर तथा उनके निवारण के लिए अपनी संकल्प-शक्ति का परिचय दे। इस देश को वैज्ञानिकों, लेखकों, विद्वानों, अर्थशास्त्रियों आदि की जरूरत तो है, मगर राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के लिए इन क्षेत्रों के माहिरों से ज्यादा सर्वलोकप्रिय, जनहितकारी, स्वतंत्र सोच व समझ रखने वाले योग्य और सेवाभावी व्यक्तिही स्वीकार्य हो सकते हैं।
’शिबन कृष्ण रैणा, अलवर
अफसर से उम्मीद
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा सुलखान सिंह को डीजीपी बनाया जाना प्रदेश की कानून व्यवस्था सुधारने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। सुलखान सिंह जैसे ईमानदार अफसर पुलिस महकमे में बहुत कम रह गए हैं। जो हैं भी तो उन्हें पिछली सरकारों ने जनता की सेवा का मौका नहीं दिया। सुलखान सिंह ने ही अखिलेश सरकार के समय पुलिस भर्ती घोटाले में जांच की और उन्हें इस ईमानदारी की यह सजा मिली कि उनकी पदोन्नति रोक दी गई। आइआइटी रुड़की से इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त 1980 बैच के सुलखान सिंह की ईमानदारी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 36 साल बड़ा पुलिस अफसर रहने के बावजूद उनके पास महज तीन कमरों का पुराना कच्चा मकान और लगभग ढाई एकड़ जमीन है। जबकि आज हकीकत कुछ इस तरह है कि पुलिस के एक साधारण सिपाही और दरोगा के पास भी करोड़ों की संपत्ति देखी जा सकती है।
पुलिस की भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, कर्तव्य पालन में लापरवाही, दबंगई आदि के चलते दिन पर दिन गिरती साख को बचाने के लिए शायद ऐसे ही अफसर की जरूरत थी। देखना है कि वे प्रदेश की कानून व्यवस्था सुधारने के अलावा आम जन के बीच पुलिस महकमे की प्रतिष्ठा कितनी बढ़ा पाते हैं!
’राजेश्वर सिंह, एएमयू, अलीगढ़

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