ताज़ा खबर
 

राजनीति के परिसर

आजादी के आंदोलन से लेकर स्वतंत्र देश की छात्र राजनीति ने कई प्रतिभावान नेता हमें दिए हैं और भविष्य का नेतृत्व भी आज के छात्रों के बीच से ही उभरेगा।

Author March 13, 2017 5:46 AM
एबीवीपी के खिलाफ प्रदर्शन करते जेएनयू, डीयू और जामिया के छात्र। (Photo Source: PTI)

आजादी के आंदोलन से लेकर स्वतंत्र देश की छात्र राजनीति ने कई प्रतिभावान नेता हमें दिए हैं और भविष्य का नेतृत्व भी आज के छात्रों के बीच से ही उभरेगा। गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलन और स्थानीय छात्र आंदोलनों के अनेक चेहरे प्रांतीय व राष्ट्रीय राजनीति में आज अहम भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। वैचारिक चर्चाओं को स्थान देने के क्रम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की विशेष पहचान रही है और इन चर्चाओं ने देश में वैचारिकी को दिशा और रफ्तार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है।

यह सर्वज्ञात है कि राष्ट्रीय स्तर के छात्र संगठन एबीवीपी, एनएसयूआई, एसएफआई, एआईएसएफआई, आईसा विभिन्न राजनीतिक दलों की छात्र इकाई हैं। पिछले वर्ष कुछ राष्ट्र विरोधी नारे जेएनयू परिसर में सुनाई दिए थे और कन्हैया कुमार, उमर खालिद आदि कुछ छात्रों की गिरफ्तारी हुई थी और न्यायालय परिसर में कुछ वकीलों ने उन पर हमला भी किया था। किसी चैनल द्वारा छेड़छाड़ की गई विडियो क्लिपिंग की बात भी सामने आई थी। बाद में ये छात्र जमानत पर छूटे और उस मामले में अभी तक चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है। इस घटना के बाद से छात्र संगठन दो समूहों में विभक्त हैं। संगठनों के समूह, उनके समर्थक और राजनीतिक एक लंबे अरसे से इस मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं और राष्ट्रप्रेम-राष्ट्रद्रोह के नाम पर उत्पन्न की गई इस उत्तेजना ने माहौल में कडुवाहट घोल दी है। राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वाले दंडित किए जाएं यह हर कोई चाहता है और यह शीघ्र होना भी चाहिए पर इसकी आड़ में राजनीति नहीं होनी चाहिए।

दूसरी ओर, दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज का मुद्दा गरमा गया है जहां ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ पर सेमिनार में जेएनयू के एक आरोपी छात्र उमर खालिद को बतौर वक्ता बुलाने का विरोध अखिल भारतीय विधार्थी परिषद द्वारा करने पर आयोजन रद्द कर दिया गया। विद्यार्थी परिषद को लोकतांत्रिक अधिकार था वक्ता का विरोध करने का लेकिन उसके कार्यकर्ताओं ने हिंसा और हमलावर प्रतिक्रिया से एक बार फिर माहौल में उत्तेजना घोल दी है। तथ्यों को जांचे और निष्कर्ष तक पहुंचे बगैर जो राष्ट्रद्रोह के आरोप का सिलसिला शुरू हुआ था वह आज तक बदस्तूर जारी है। एक खेमा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रहा है तो दूसरा किंतु-परंतु से शुरुआत कर रहा है।

राजनीतिक नेतृत्व अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए छात्र राजनीति का दुरुपयोग करता रहा है और यथास्थिति के समर्थक छात्रों को राजनीति से दूर रहने की सलाह देते रहे हैं। आज देश की हर बहस को राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रद्रोह के खेमे-खांचे में बांटने की जुगत की जा रही है। राजनीतिक विफलताओं और अवाम की प्राथमिकताओं से ध्यान हटाने में फौरी तौर पर यह नीति कामयाब हो सकती है, फिर से चुनाव भी जितवा सकती है पर नफरत और घृणा आधारित बहसें सार्थक संवाद के रास्ते संकरे करेंगे और उसका उपचार आसान नहीं होगा।
’सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर

विधानसभा चुनाव नतीजे 2017: उत्तर प्रदेश में ये चेहरे हो सकते हैं बीजेपी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App