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अतीत का आईना

ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए उनके रास्ते अवश्य गांधीजी से भिन्न थे, लेकिन देश की जनता को अंग्रेजी दासता के विरुद्ध उद्वेलित करने में गांधीजी के योगदान को उन्होंने कभी नकारा नहीं था।

Author December 4, 2017 06:12 am
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ता। (फाइल फोटो)

अतीत का आईना
जब आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में दशहरे के दिन हुई, तब ब्रिटिश दासता के विरुद्ध आजादी की लड़ाई तेज हो चुकी थी। 1921 के असहयोग आंदोलन के बाद से महात्मा गांधी स्वतंत्रता संग्राम के सर्वमान्य नेता बन चुके थे। जालियांवाला बाग का जनसंहार हो चुका था। संघ की स्थापना के अगले पांच वर्ष में ही भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों ने लाला लाजपतराय की हत्या का बदला ले लिया था। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के ‘बम का दर्शन’ से देश गुंजायमान हो चुका था। संघ की स्थापना के अगले ही कुछ वर्षों में नमक सत्याग्रह हुआ। साइमन कमीशन के खिलाफ पूरा देश उद्वेलित था। 1939 में अंग्रेज वायसराय ने भारतीयों की सहमति के बिना दूसरे विश्वयुद्ध में भारत को भी घसीट लिया था, जिसकी देश में उग्र प्रतिक्रिया हो रही थी। इसका चरमोत्कर्ष अगस्त 1942 में गांधीजी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ और ‘करो या मरो’ के आह्वान के साथ हुआ था। यह वह कालखंड था जब देश का हर जागरूक नागरिक आजादी की लड़ाई में अपना सब कुछ न्योछावर कर देने के लिए उत्सुक था।

उस ऐतिहासिक कालखंड में आरएसएस कहां था! उनके एक बड़े विचारक वीडी सावरकर अंग्रेजों से माफी मांग कर जेल से बाहर आ चुके थे। जिनके पास आजादी की लड़ाई का कोई भी महत्त्वपूर्ण नाम नहीं है, आज वे सरदार पटेल, मदनमोहन मालवीय, सुभाषचंद्र बोस और यहां तक कि मार्क्सवादी क्रांतिकारी अमर शहीद भगतसिंह को भी अपना बताने की हास्यास्पद चेष्टा करते रहते हैं। दिलचस्प यह है कि ये लोग मुगलकालीन इमारतों के बारे में तो बढ़-चढ़ कर दावे करते हैं, लेकिन ब्रिटिशकालीन इमारतों के विरुद्ध कभी एक शब्द भी नहीं बोलते। ये लोग जिन क्रांतिकारियों का नाम लेकर गांधीजी पर निशाना साधने की कुचेष्टा करते हैं, उनके मन में गांधीजी के प्रति गहरे आदर की भावना थी। ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए उनके रास्ते अवश्य गांधीजी से भिन्न थे, लेकिन देश की जनता को अंग्रेजी दासता के विरुद्ध उद्वेलित करने में गांधीजी के योगदान को उन्होंने कभी नकारा नहीं था।गांधीजी से भिन्न रास्ता सुभाषचंद्र बोस, जयप्रकाश नारायण और डॉ राममनोहर लोहिया का भी था। लेकिन क्या इन स्वतंत्रता सेनानियों के मन में गांधीजी के प्रति आदर में कोई कमी थी? लेकिन जिन्हें इस इतिहास से कुछ लेना-देना नहीं है, वे वास्तविकता को नकारते हुए भ्रम और विद्वेष फैलाने की कोशिश करते रहते हैं।
’प्रवीण मल्होत्रा, इंदौर

मजबूर बचपन
हाल के वर्षों में बालश्रम एक विकराल समस्या बन कर उभरा है। सुलभ और सस्ते श्रम का स्रोत होने के कारण बच्चों को किसी भी काम में लगा दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुमान के मुताबिक पूरे विश्व में पांच से सत्रह साल के आयुवर्ग के लगभग पंद्रह करोड़ बच्चे श्रमिक के रूप में काम में लगे हुए हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग अठहत्तर लाख बाल श्रमिक हैं, जिनमें तैंतालीस प्रतिशत लड़कियां हैं। बाल श्रमिकों के रूप में काम कर रहे बच्चों में से इकहत्तर प्रतिशत बच्चे कृषिकार्य, शिल्पकारी और पुश्तैनी कार्यों में लगे हुए हैं। इनमें पुश्तैनी कार्य में लगे बच्चों का प्रतिशत ही उनहत्तर फीसद से अधिक है।
वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने 2025 तक बालश्रम को पूरी तरह खत्म कर देने का लक्ष्य रखा है। लेकिन इस दिशा में प्रगति बेहद धीमी है। आंकड़ों के अनुसार, तमाम प्रयासों के बाद भी 2012 से 2016 के बीच बालश्रम में कमी की दर केवल एक प्रतिशत रही, जबकि 2008 से 2012 के बीच यह दर तीन प्रतिशत रही थी। भारत के संदर्भ में इस धीमी गति का प्रमुख कारण देश के ढीले-ढाले श्रम कानून हैं, जिनमें बच्चों को अपने परंपरागत पुश्तैनी कार्यों में लगाए जाने की छूट देने जैसे प्रावधान सम्मिलित हैं जो सारे वैश्विक प्रयासों पर पलीता लगाते दिखाई देते हैं।
बाल श्रम के लिए जिम्मेदार अन्य कारणों में अंतरराष्ट्रीय समितियों के साथ समन्वय की कमी, सार्वभौमिक आधारभूत शिक्षा का अभाव, श्रम विभाग द्वारा निरीक्षण में कोताही के साथ-साथ आम लोगों में जागरूकता और इच्छाशक्ति की कमी प्रमुख हैं। आज भी एक ओर तथाकथित सुशिक्षित सभ्रांत वर्ग के लोग सस्ते श्रम के लिए नाबालिगों का शोषण करते पाए जाते हैं, दूसरी ओर यही लोग समाज में उनकी सुरक्षा और शिक्षा का आडंबर रचते हैं। इस अमानवीय स्थिति पर काबू पाने के लिए कड़े श्रम कानून बनाने के साथ साथ मौजूदा नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना होगा।
’ऋषभ देव पांडेय, जशपुर, छत्तीसगढ़
इंसान का मजहब

हम एक ऐसे देश में रहते हैं जो सभी धर्मों को समान आदर देता है और किसी को भी किसी भी धर्म में जाने की छूट है। इसीलिए हम भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र कहते हैं। लेकिन आमतौर पर एक इंसान पूरी जिंदगी एक धर्म के घेरे में बिता देता है। शायद इसलिए कि धर्म को हम जिंदगी जीने का तरीका कहते हैं। यह विडंबना है कि व्यक्ति अपने बारे में जाने बिना दूसरों को जानने की कोशिश करता है। यही कोशिश ‘कुएं से निकले खाई में गिरे’ वाली कहावत को चरितार्थ करती नजर आती है। क्यों ऐसा है कि हम इंसानियत और धर्म को जाने बिना दुनिया भर के पंथों में उलझते जाते हैं?
’चंद्रकांत, एएमयू, अलीगढ़
समता का दायरा
हमारे समाज में बड़ी तादाद में उपेक्षित लोग हैं, जिन्हें समाज में समान दृष्टि से नहीं देखा जाता है। समाज में अनेक उपनामों से पुकारा जाता है। लंबे संघर्षों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तीसरे लिंग के रूप में स्वीकार करने का आदेश दिया है। इसके बावजूद समाज में उन्हें समान दर्जा नहीं मिल पाया है। संविधान में इस बात का प्रावधान है कि लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। लेकिन सच्चाई क्या है यह हम सभी जानते हैं। इस तरह की मानसिकता से लड़ने के लिए शिक्षा पद्धति पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि समाज में चली आ रही विकृत मान्यताओं और विकृत मानसिकता को बदला जा सके।
’आरजू नेगी, पंजाब विश्वविद्यालय

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