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सियासी संवेदना

सियासत के वैर-भाव में लाभ-हानि का अपना गणित है।

Author Published on: November 10, 2016 3:51 AM
OROP: जंतर-मंतर पर पूर्व सैनिकों की रैली आज

समान रैंक समान पेंशन की मांग को लेकर आत्महत्या करने वाले पूर्व सैनिक को भाजपा से वैर रखने वाली पार्टियों ने शहीद का दर्जा दे दिया है। सियासत के वैर-भाव में लाभ-हानि का अपना गणित है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने पूर्व सैनिक रामकिशन ग्रेवाल को शहीद मानते हुए एक करोड़ रुपए की सहायता राशि दिए जाने की घोषणा कर दी तो हरियाणा के मुख्यमंत्री ने दस लाख रुपए देने की। वन रैंक वन पेंशन की मांग करने वाले हाकी सब अभी आसमान की ओर ताक रहे हैं और कुछ बगलें झांक रहे हैं। भाजपा रामकिशन को सैनिक कम और कांग्रेसी ज्यादा मान रही है। उसकी आत्महत्या के कारण गौण हो गए हैं और सियासी खेल जबरर्दस्त तरीके से खेला जा रहा है। इस खेल में मुआवजा, परिवार के सदस्य को सरकारी नौकरी, मकान-प्लाट आदि-आदि की घोषणाएं होती रहेंगी। ऐसे में कितना प्यारा संदेश जा रहा है कि आप अपनी जायज-नाजायज मांग पूरी न होने पर आत्महत्या करो, मैं तुम्हारे परिवार को लाख या करोड़ रुपए और सुविधाएं भी दूंगा!

हाल के दिनों में फुटपाथ पर सोए हुए चार लोगों को एक ट्रक ने कुचल दिया। प्रदेश के मुख्यमंत्री ने द्रवित होकर बचे हुए परिजन को चार-चार लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा कर दी। अब गंदी बस्ती में नारकीय जीवन जीने वाले भी सोच सकते हैं कि ऐसी जिंदगी से तो फुटपाथ पर होने वाली मौत अच्छी! मरने पर चार लाख और नारकीय जीवन जीने के लिए हजार-पांच सौ की सामाजिक सुरक्षा पेंशन! खैर, सरकार तो सरकार है, जब और जिस रूप में भी मेहरबान होना चाहे, हो सकती है!

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चाहे मुआवजा देना हो या पुरस्कार अथवा सम्मान राशि, यह सरकार की इच्छा है कि किसे कितनी राशि दे। कम दुखी हुए तो कुछ हजार या कुछ लाख हो सकती है मुआवजा राशि, ज्यादा दुखी हो गए तो लाखों या करोड़ में भी मुआवजा राशि हो सकती है। इसी तरह खुशी के माहौल में भी केजरीवाल जैसे कुछ भी कर सकते हैं। इसमें शायद खुशी या गम की जनभावना ज्यादा काम करती है। यदि कोई वर्ग, समूह किसी घटना से ज्यादा प्रभावित होता है तो उस अनुपात में राशि कम-ज्यादा हो सकती है।

यह सियासी घालमेल है। इसे मुझ जैसा मूढ़ मति नहीं समझ सकता। सीधी-सी बात है कि इसमें कोई यह प्रश्न न उठाए कि सरकारी खजाना किसका है! खजाने में रखा पैसा किसका है! ऐसे मामलों में राशि देने के क्या नियम होने चाहिए! जनता को अपने धन का हिसाब लेने का कितना अधिकार है! ये सब अर्थहीन बातें हैं। हमने एक बार उन्हें जब सरकार चुन लिया है तो चुन लिया। अब कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाना चाहिए!
’प्रदीप उपाध्याय, वीर सावरकर नगर, इंदौर

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