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किसानों की सुध

मध्यप्रदेश को पिछले पांच वर्ष से कृषि कर्मण्य अवार्ड प्राप्त हो रहे हैं, सरकार इसे अपनी उपलब्धियों के ढोल के रूप में बजा रही है और फिर अचानक किसान आंदोलन और उस पर गोलीबारी की खबरें सुर्खियों में गर्इं।

Author June 8, 2017 5:41 AM
मध्य प्रदेश के किसान नेताओं ने दावा किया है कि मंदसौर में मंगलवार को किसानों द्वारा विरोध प्रदर्शन के बीच सुरक्षा बलों द्वारा की गई गोलीबारी में पांच नहीं आठ किसानों की मौत हुई है और सरकार मौत का आंकड़ा छिपाने में लगी है।

किसानों की सुध

यह अजीब दुर्योग है कि मध्यप्रदेश को पिछले पांच वर्ष से कृषि कर्मण्य अवार्ड प्राप्त हो रहे हैं, सरकार इसे अपनी उपलब्धियों के ढोल के रूप में बजा रही है और फिर अचानक किसान आंदोलन और उस पर गोलीबारी की खबरें सुर्खियों में गर्इं। किसानों की हड़ताल के दिन से सब्जी, दूध व दूध-उत्पादों का जो संकट प्रारंभ हुआ था उसने विकराल रूप ले लिया है। एक तरफ फल-सब्जी फेंकने और दूसरी ओर दूध बहाने के समाचार आते रहे हैं तो तीसरी ओर इस स्थिति का फायदा उठाते हुए दूध के दाम सत्तर रुपए लीटर से ज्यादा हो गए हैं। बच्चे और बीमार दूध के लिए हलकान हैं तो गृहणियां रसोई घर में परेशान हैं।
ऐसा लगता है कि लंबे अरसे का किसानों के गुस्से का लावा अनायास फूट पड़ा है जबकि वास्तविकता यह नहीं है। अपनी उपज के वाजिब दाम न मिलने पर आलू, टमाटर आदि को सड़कों पर फेंकने या खेतों में फसलों को नष्ट करने के समाचार हम लगातार देख-सुन रहे हैं; किसानों की आत्महत्याएं भी थम नहीं रही हैं। दरअसल, सरकार किसानों की समस्याओं की लगातार अनदेखी व अवहेलना कर रही है। चुनावी घोषणा पत्र में स्वामीनाथान समिति की अनुशंसानुसार कृषि उपज की लागत के डेढ़ गुना (150 प्रतिशत) दाम की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। अलबत्ता आगामी चुनाव को लक्ष्य कर 2022 तक किसानों की आय दो गुनी करने का झुनझुना लगातार बजाया जा रहा है और यह भी स्पष्ट नहीं किया जा रहा है कि यह तथाकथित दो गुनी आय वृद्धि ग्रॉस (सकल) या नेट होगी। अभी तक कृषि की समस्या का एकमात्र हल फसल बीमा में देखने व प्रचार करने वाली सरकार को किसानों को दी गई 25 व 30 रुपए की बीमा धनराशि भी ध्यान में रखनी चाहिए।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलन व हड़ताल एक हथियार की तरह उपयोग किए जाते हैं और ये एक क्रमबद्ध प्रक्रिया की तरह होते हैं। इस आंदोलन का नेतृत्व कौन कर रहा है और किसने आह्वान किया है यह भी स्पष्ट नहीं है। अभी किसी किसान सेना का नाम सामने आया है और किसान संघ ने भी इससे जुड़ने की बात कही है। किसानों को अपना एक स्वतंत्र संगठन बनाकर समग्र नीतियों के संदर्भ में अपनी समस्याओं के कारणों का विश्लेषण करना चाहिए जिनमें महंगे कर्ज, खाद, बीज, कीटनाशक दवाओं, बिजली, पानी आदि का महंगा होना, पेटेंटीकरण की नीति, एकाधिकार, कृषि आयात की मात्रात्मक सीमा की समाप्ति की नीति आदि सम्मिलित हैं। इन नीतियों में सुधार, भंडारण सुविधाओं का विस्तार व कृषि उपज के लागत मूल्य का 150 प्रतिशत दाम व कृषि उत्पाद की प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना किसान आंदोलन के प्रमुख मुद्दे होने चाहिए। किसी आंदोलन के पूर्व पूरी तैयारी और आंदोलन में क्रमबद्धता होनी चाहिए वरना दिशाभ्रम का खतरा भी बना रहेगा।सरकार ने इस आंदोलन से स्थानीय स्तर पर निपटने व बल प्रयोग न करने के दिशा-निर्देश दिए हैं लेकिन उसके बाद भी गोलीबारी, लाठीचार्ज व अश्रुगैस का प्रयोग हुआ है। चुनावी लाभ-हानि के गणित से परे सरकार को सीधे संवाद का रास्ता अपना कर किसानों की सभी समस्याओं के हल के लिए गंभीर, सार्थक व ठोस पहल करनी चाहिए।
’सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर

 

भ्रष्टाचार पर लगाम
केंद्र सरकार ने हाल ही में एक बढ़िया फैसला किया है कि अब किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच छह महीने में पूरी करनी होगी। इसके लिए 50 साल पुराने सेंट्रल सिविल सर्विस कानून में बदलाव किया गया है। अभी तक यदि किसी सरकारी कर्मचारी का भ्रष्टाचार पकड़ में आ भी जाता है तो नियम-कायदों में उलझा कर उस मामले को या तो रफा-दफा कर दिया जाता है या फिर अदालत में सालों के लिए लटका दिया जाता है। लेकिन अब इस नए कानून के बाद भ्रष्ट कर्मचारी बच नहीं सकेंगे। इससे निश्चित रूप से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।
’बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

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