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गरिमा के विरुद्ध

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरों को तो जुबान संभाल कर बोलने के लिए ललकारते हैं पर खुद वैसी ही भाषा बोलते हैं, मानो दूसरों की कोई गरिमा नहीं है।

Author February 15, 2017 4:56 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरों को तो जुबान संभाल कर बोलने के लिए ललकारते हैं पर खुद वैसी ही भाषा बोलते हैं, मानो दूसरों की कोई गरिमा नहीं है। वे जिस कुत्ता संस्कृति की बात करते हैं, उससे खुद क्योंकर अलग नहीं हो पाते? क्या उनसे पहले के सत्तारूढ़ या विपक्षी नेताओं का कोई मान-सम्मान नहीं है? वे कहते हैं कि उनके पास कांग्रेसियों की जन्मपत्री है, ज्यादा बोले तो खोल कर रख देंगे! उन्होंने भला बोलने में कौन-सी कसर छोड़ रखी है? क्या सारी गरिमा और आत्मसम्मान सिर्फ नरेंद्र मोदी का है? क्या उनकी सिर्फ प्रशंसा हो, आलोचना नहीं? विपक्ष में रहते हुए, यहां तक कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए, उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री की प्रशंसा की थी या आलोचना?

वे केंद्र सरकार के मुखिया होकर अपनी करनी को छुपाते हुए विपक्ष को गरिया रहे हैं और खुद की नाकामी की तोहमत भी विपक्ष पर मढ़ रहे हैं। मानो उनसे पहले इस देश में कुछ अच्छा हुआ ही नहीं, जो कुछ हो रहा है, वे ही कर रहे हैं! ‘मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू।’ कालाधन, नोटबंदी, खेती, किसानी, रोजगार, महंगाई, विकास, रुपया, शिक्षा, चिकित्सा, भाईचारा कुछ भी तो पटरी पर नहीं! उद्यम और निवेश के लिए स्टैंड-अप, स्टार्ट-अप, मेक इन इंडिया जैसे नित नए नाम ‘नाम बड़े, दर्शन छोटे’ से ज्यादा कुछ साबित नहीं हो पा रहे हैं।दरअसल, मोदी के खिसियाने का कारण भी यही है कि उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान जो बड़े-बड़े वादे किए थे, उनका रत्तीभर भी कार्यरूप सामने नहीं आया है। विपक्षी, चाहे वे राहुल गांधी हों या कोई और, उनके वादे पूरे न होने पर जो निरंतर सवाल उठा रहे हैं, उनका जवाब प्रधानमंत्री मोदी से न तो संसद में देते बन रहा है और न आमसभाओं में। खिसिया कर वे विपक्षियों का दामन नोचने का अभियान चलाए हुए हैं जो उन्हें कहीं से राहत नहीं देने वाला है।

राहुल गांधी के बारे में सोशल मीडिया पर उन्हें दी जाने वाली उपमाओं का जिक्र कर जिस तरीके से वे उनका उपहास उड़ा रहे हैं, वह प्रधानमंत्री पद पर बैठे किसी व्यक्ति को कतई शोभा नहीं देता है। फिर उसी सोशल मीडिया पर स्वयं मोदी को भी कम उपमाएं नहीं दी जा रही हैं। उनके लिए भी फेंकू और जुमलेबाज के जो विषेषण और उपमाएं दी जा रही हैं, क्या उनका संज्ञान उन्हें नहीं है? उनके संघी साथियों के नित आते विषैले बोल किससे छिपे हैं? जब सत्ता में बैठा मुखिया विषबोलों पर चुप्पी साधे रहे तो वह उस पद की गरिमा को खो देता है। ऐसी स्थिति में पद से मिलने वाला सम्मान उसे कैसे हासिल हो पाएगा? अपनी आंख फूटी तो दूजे की भी फूटे, तब बात बने! यह आंखफूटी का सुख ही मोदी की सत्ता का आधार है। नोटबंदी में भी यह खूब भुनाया गया। आंखफूटी के इस सुख में हासिल किसी को कुछ नहीं, नुकसान ही नुकसान होगा।
’रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

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