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पिछड़ेपन की होड़

कई राज्यों में विभिन्न समुदाय अपने को पिछड़ा घोषित करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं।

Author August 23, 2017 06:02 am
मराठाओं ने सरकारी नौकरी में आरक्षण के लिए सितंबर में जुलूस निकाला था

पिछड़ेपन की होड़

आज जहां हम समावेशी विकास के प्रतिमान स्थापित करने में लगे हैं वहीं कुछ समुदायों और राज्यों में खुद को पिछड़ा साबित करने की होड़ लगी है। पता नहीं यह कौन-सी नई अवधारणा है, जिसमें सब खुद को पिछड़ा घोषित करने में लगे हैं। कई राज्यों में विभिन्न समुदाय अपने को पिछड़ा घोषित करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। गुजरात में पाटीदार, राजस्थान में गुर्जर और महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के आंदोलन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

हमारे महापुरुषों ने सपने संजोए थे कि भारत का नागरिक समाज विकास और समृद्धि प्राप्त करने की ओर अग्रसर हो, लेकिन हम तो खुद को पिछड़ा साबित करने में लगे हैं! अगर सरकारें अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए ऐसी मांगों को मानती हैं तो आने वाले समय में अन्य समुदाय भी खुद को पिछड़ा साबित करने के लिए यही रास्ता अख्तियार करेंगे। लिहाजा, हमारे राजनीतिकों और नीति नियंताओं को ऐसी नीतियां लागू करने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए जिनसे समावेशी और समग्र विकास हो और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक भी विकास की पहुंच सुनिश्चित हो सके। तभी इस पिछड़ेपन की होड़ से बचा जा सकता है।

इसी कड़ी में बिहार और आंध्र प्रदेश की सरकारें भी केंद्र से आग्रह कर रही हैं कि उनके राज्य को पिछड़े प्रदेश का दर्जा दिया जाए। इस पिछड़ेपन की मानसिकता से हमें बाहर आना होगा। प्रधानमंत्री ने प्रतिस्पर्धी संघवाद की वकालत की है जिससे विकास और निवेश को प्रोत्साहित किया जा सके। केंद्र सरकार ने कहा है कि हम उन्हीं की सहायता करेंगे जो पिछड़ा होने के लिए नहीं, बल्कि आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करेंगे। इसलिए सरकार को प्रतिस्पर्धी संघवाद को बढ़ावा देना चाहिए जिससे कम से कम राज्यों द्वारा अपने को पिछड़ा साबित करने की मानसिकता को हतोत्साहित किया जा सके।
’उत्तम प्रकाश, बांदा, उत्तर प्रदेश
लगे हाथ
तीन तलाक के बाद अब लगे हाथ दहेज प्रथा पर भी रोक लगाई जानी चाहिए। हमारे समाज में दहेज एक अभिशाप बन गया है। इसकी वजह से भी अनगिनत जिंदगियां बर्बाद हुर्इं और हो रही हैं। लिहाजा, समाज को अपने अंदर बदलाव लाकर दहेज का विरोध करना चाहिए। जिन लोगों में स्वाभिमान होता है वे दहेज नहीं लेते। जो लोग सिर्फ इस डर से दहेज देते हैं कि उनकी बेटी की शादी नहीं होगी तो वे भी बहुत गलत कर रहे हैं इस डर के साथ जी कर। जब तक आप दहेज का विरोध नहीं करेंगे तब तक यह कुप्रथा खत्म होने वाली नहीं है, इसलिए सब लोगों को आगे आकर इसका विरोध करना होगा।
’निमिषा गुप्ता, नई दिल्ली

 

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