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किसान का दुख

किसानों की खराब हालात के लिए भ्रष्टाचार भी जिम्मेवार है। इसीलिए जरूरतमंद किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है।

Author January 1, 2018 6:10 AM
अपने खेतों में खड़ा एक किसान। (Photo Source: Indian Express Archive)

किसान का दुख
संजीव पांडेय ने अपने लेख ‘सरकारी बेरुखी से बदहाल किसान’ (28 दिसंबर) में किसानों की दुर्दशा के लिए सरकारों को दोषी ठहराया है। सरकारों की योजनाओं में तमाम खामियां हैं, जिसके चलते किसानों को सड़कों पर उतरना पड़ता है। सरकार को उन खामियों पर विचार करना चाहिए, ताकि किसानों की हर समस्या का समाधान हो सके, उनको उनका हक मिल सके और वे तनावमुक्त रहकर खेतीबाड़ी की तरफ ध्यान दे सकें। देश के विकास के दावे तब तक खोखले ही रहेंगे, जब तक बुनियादी समस्याएं हल नहीं हो जातीं। इनमें किसानों की समस्याएं भी शामिल हैं। महात्मा गांधी ने किसानों को भारत की आत्मा कहा था। लेकिन आज किसानों की समस्याओं पर राजनीति करने वाले ज्यादा और उनकी समस्याओं की तरफ ध्यान देने वाले कम हैं। किसानों की खराब हालात के लिए भ्रष्टाचार भी जिम्मेवार है। इसीलिए जरूरतमंद किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

हंगामे की भेंट
इस बार भी सदन के सत्र का अधिकांश समय लोकहित के मुद््दों पर विचार-विमर्श करने की अपेक्षा हंगामे की भेंट चढ़ता जा रहा है। हाल ही में राज्यसभा में सचिन तेंदुलकर ‘राइट टु प्ले’ के संबंध में बोलने वाले थे। यह सदन में उनका पहला भाषण था, लेकिन उन्हें शांतिपूर्वक सुनना तो दूर, उन्हें बोलने भी नहीं दिया गया। सदन के अन्य सदस्य लगातार हंगामा करते रहे। पाठीसीन सभापति महोदय ने बार-बार समझाया। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा।  सदन लोकतंत्र का सबसे अहम स्थल होता है। लेकिन लगता है सदन के सदस्यों को संसदीय गरिमा की ज्यादा फिक्र नहीं है। जब हमारे द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि ही इस तरह का व्यवहार करते हैं, तो जनता किससे क्या अपेक्षा करेगी?
’प्रांसुल विजयप्रभा जायसवाल, इंदौर
बेरोजगारी का विकास

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