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चौपाल- हाशिये पर विज्ञान, बदलाव की राह

हमारा भारतीय समाज, कुछ अपवादों को छोड़, काफी पिछड़ा हुआ रहा है।

Author December 18, 2017 5:03 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

हाशिये पर विज्ञान

मानव सभ्यता को आधुनिक बनाने में विज्ञान का बहुत बड़ा योगदान है। वर्तमान में सुविधाजनक जीवन, विज्ञान के बिना अधूरा-सा लगता है। विज्ञान की अन्य शाखाओं औषधि विज्ञान, जीव विज्ञान, भौतिक विज्ञान, खगोल विज्ञान, दूरसंचार विज्ञान के क्षेत्रों के बहुत महत्त्व हैं। नई-नई तकनीक और अनुसंधान के जरिए मानवीय कार्य को आसान बनाया जा सकता है। लेकिन भारत अनुसंधान के क्षेत्र में काफी पीछे है।

सवाल है कि हम अनुसंधान में कहां खड़े हैं। कम से कम हम वहां तो नहीं हैं, जहां होना चाहिए। दुनिया के कई छोटे देश शोध में भारत से आगे निकल चुके हैं। भारत में कई सालों से एक-दो को छोड़ दें तो कोई वैज्ञानिक नहीं हुआ, जिसे दुनिया के लोग अनोखी देन के कारण पहचानते हों। 1930 में प्रो सीवी रमन को नोबेल पुरस्कार मिला था, लेकिन आज भी हम विदेशी लोगों को नोबेल मिलने पर खुशी जताते हैं। भारत चीन और अमेरिका से काफी पीछे है।
इसके पीछे बड़ा कारण है कि दे में कोई ऐसा बुनियादी ढांचा विकसित नहीं हो पाया, जिससे देश में बड़े पैमाने पर अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जा सके। ऐसे प्रोत्साहन वाले कार्यक्रमों में भी कोई नई बात नहीं कही जाती है और नेता भी अपने राजनीतिक एजेंडे का मंच बना लेते हैं, क्योंकि अरुचि से कोई तकनीक और विज्ञान की बात नहीं करना चाहता। ये दरअसल बजट को खर्च करने और रस्म अदायगी के कार्यक्रम बन रहे हैं। इन्हीं कमियों के कारण अधिकतर युवा अनुसंधान के बजाय सूचना तकनीक और प्रबंधन में कॅरियर बना लेते हैं।
’महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान
बदलाव की राह
हमारा भारतीय समाज, कुछ अपवादों को छोड़, काफी पिछड़ा हुआ रहा है। यहां ऐसी सामाजिक बुराइयां व्याप्त रही हैं कि आज भी इनके बारे में सुन कर दिल दहल जाता है। स्कूलों में शिक्षा नाम की कोई व्यवस्था खासकर महिलाओं और दलितों के लिए नहीं थी। अंग्रेजों के आने के बाद भी हमारे देश में सती प्रथा और नरबलि प्रथा व्याप्त थी, जबकि कन्याभ्रूण हत्या, बाल विवाह, अस्पृश्यता आज भी कई जगहों पर मौजूद हैं। वर्तमान समय में हरेक मां-बाप यह चाहते हैं कि उनकी संतान पढ़-लिख कर उनका नाम रोशन करे। इसके लिए वे उनकी स्वतंत्रता को बाधित नहीं करते हैं। मुख्य बिंदु यह है कि विपरीत लिंगों के बीच एक दूसरे के प्रति आकर्षण एक नैसर्गिक बात है। इसके आगे प्रेम और विवाह का चरण भी आता है। विडंबना यह है कि हमारे समाज में प्रेम विवाह को आज भी अवांछनीय माना जाता है।

यह ध्यान देने वाली बात है कि जब हम हरेक क्षेत्र में पश्चिमी दुनिया का अनुसरण कर रहे हैं तो उसके साथ अन्य तत्त्वों का आना भी स्वाभाविक है। मसलन, इससे हमारा रहन-सहन, खान-पान, सभ्यता और संस्कृति जैसे बहुत सारे पहलू प्रभावित होते हैं। आज भारत की सभ्यता और संस्कृति एक तरह के संक्रमण काल से गुजर रही है। अभिवावकों को मौजूदा दौर की सच्चाई को स्वीकार करना होगा और इसी के मुताबिक उन्हें अपने बच्चों से व्यवहार करना होगा। बच्चों को भी नैतिक जिम्मेदारी के साथ अपने जीवन साथी का चयन करना चाहिए। स्वतंत्रता का बेजा फायदा उठाना उनके लिए ही घातक होगा।
’शशि प्रभा, वायुसेना स्टेशन, आगरा

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