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प्रगति के बावजूद

महिलाएं सबसे ज्यादा जच्चगी के दौरान मर जाया करती थीं, तब हमने सिजेरियन पद्धति का विकास किया और इस आंकड़े में गिरावट आई।
Author August 8, 2017 05:55 am
तस्वीर की इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर हुआ है। (फाइल फोटो)

प्रगति के बावजूद

पहले लाखों-लाख लोग हैजे, चेचक और महामारी से मर जाया करते थे। फिर हमने टीके इजाद किए। महिलाएं सबसे ज्यादा जच्चगी के दौरान मर जाया करती थीं, तब हमने सिजेरियन पद्धति का विकास किया और इस आंकड़े में गिरावट आई। एक्सरे, आॅक्सीजन मास्क से लेकर हमने खून-पानी चढ़ाने की तकनीकों के साथ-साथ मरीज को कम से कम तकलीफ हो इसके लिए बेहोश करने के आसान से आसान तरीके खोज लिए। जिस प्रकार से शोध जारी हैं, कोई बहुत बड़ी बात नहीं है कि आने वाले वक्त में एड्स और कैंसर जैसी लाईलाज बीमारियों का भी इलाज ढूंढ़ लिया जाए। मानव जीवन की रक्षा और उसकी बेहतरी के लिए चिकित्सा विज्ञान की इतनी तरक्की शानदार कही जाएगी। मगर इसी के बरक्स सामाजिक विज्ञान की प्रगति देखने पर बेहद निराशाजनक तस्वीर बन जाती है।

मानव का शरीर अपना पूरा जीवन जिए, इसके इंतजाम के साथ-साथ इसी तर्ज पर क्या हमने यह चिंता भी की है कि एक समुदाय के रूप में भी वह स्वस्थ और निरोग रहे! अभी पिछली ही सदी में धर्म के नाम पर हम बंट चुके हैं, जिसमें महज कुछ दिनों में दस लाख लोगों को उन्हीं के आस-पड़ोस के लोगों ने मार दिया था। करोड़ों लोग अपनी जड़ों से उखड़ कर देशांतर यात्रा पर निकल पड़े थे। इस सदी की शुरुआत भी कुछ ऐसी ही हुई जब हमने गोधरा में तीर्थयात्रियों को जला देने की घटना के बाद एक भयानक दंगे का धब्बा अपने ऊपर लगवाया था। पिछली सदी में गणेश की मूर्ति अचानक दूध पीने लगी थी तो इस सदी की शुरुआत में मंकी मैन अथवा मुंहनोचवा जैसी किसी ऐसी आपदा का सामना किया गया जिसकी सच्चाई संदिग्ध रही। इस सदी के दूसरे दशक में ‘बीफ’ के नाम पर भीड़ ने कत्लेआम मचाया। और अब चोटी काटने की अफवाह से देश का एक खास हिस्सा आक्रांत हो गया है। बड़ी विडंबना है कि यह खास हिस्सा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और उसके आस-पास का ही है। इस बेवकूफी की इंतिहा तब हो गई जब आगरा के डौकी गांव की एक बुजुर्ग महिला मान देवी को चोटी काटने वाली होने के संदेह में पगलाई भीड़ ने पीट-पीट कर मार दिया। इसे क्या कहा जाए!

क्या यह मंगल अभियान में झंडे गाड़ने और चीन के साथ भावी युद्ध में जीत दर्ज करने वाले मुल्क की तस्वीर है! इन सब बीमारियों का इलाज हमारे समाज वैज्ञानिक क्यों नहीं खोजते? जाहिलियत से भरी ऐसी घटनाओं के बाद विदेशियों द्वारा भारत को संपेरों के देश और अजायबघर के रूप में देखने की सोच सही लगने लगती है और संसार के सर्वाधिक विस्तृत लोकतांत्रिक समाज के रूप में शर्म से हमारा सर झुक जाता है। आखिर हमारा समाज विज्ञान इतना पीछे क्यों है? इन शर्मनाक घटनाओं की पुनरावृत्ति अब और नहीं हो इसके लिए हमें सोशल साइंस के कुछ शानदार टीकों को इजाद करना होगा, समाज विज्ञान की कई महत्त्वपूर्ण खोजें करनी होंगी।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली
कड़ी सजा
हमारे कानून इंसानों को कम और जानवरों को ज्यादा महत्त्व देते दिख रहे हैं। मसलन, गोहत्या के जुर्म में 14 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है जबकि दूसरी ओर पूरे देश में आए दिन कितनी ही लड़कियां बलात्कार जैसे अपराध की शिकार बनती हैं लेकिन उनमें आरोपियों-अपराधियों को या तो जमानत पर छोड़ दिया जाता है या फिर तीन से चार साल की सजा के बाद रिहा कर दिया जाता है। अगर कानून बनाना ही है तो सभी की सुरक्षा के मद्देनजर बनाना चाहिए। बलात्कार जैसे अपराध के दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देनी चाहिए।
’दीपक शर्मा, चंडीगढ़

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