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संघर्ष का रास्ता

भारत अपवाद रहा जिसने शुरुआत समानता के महान आदर्शों को संविधान और नीतियों में जगह देकर की। हालांकि कई बार यह व्यवहार में आम जनता तक नहीं पहुंचा और समाज के विभिन्न तबकों ने अपने हुकूक की लड़ाई लड़ी।
Author October 4, 2017 02:41 am

दुनिया की तमाम तानाशाहियां अपने अतिवाद के लिए जानी गई हैं। यह अतिवाद एक नस्ल, एक विचार और एक ही तरह की संस्कृति को थोपने के लिए रहा है। ऐसे में उनके यहां अल्पसंख्यक तबका संतुष्ट कैसे हो सकता है! दूसरी ओर अमेरिका-ब्रिटेन सरीखा दुनिया का कोई भी आधुनिक लोकतंत्र ऐसा नहीं रहा होगा जिसने अपनी शुरुआत सबके लिए बराबर अवसरों के साथ की हो। समय के साथ सबने खुद को उदार और समावेशी बनाया है। भारत अपवाद रहा जिसने शुरुआत समानता के महान आदर्शों को संविधान और नीतियों में जगह देकर की। हालांकि कई बार यह व्यवहार में आम जनता तक नहीं पहुंचा और समाज के विभिन्न तबकों ने अपने हुकूक की लड़ाई लड़ी।

बौद्ध बहुल हमारा पड़ोसी बर्मा, जो अब म्यांमार है, में भी एक जमाने तक लोकतंत्र का रास्ता बंद रहा और इसके खिलाफ उसकी अगुआ आंग-सान सू ची नेसत्याग्रह का रास्ता चुना। अन्य देशों की तरह सैन्य शासकों की तानाशाही में इस दौरान उस देश ने अपने एक अल्पसंख्यक समूह के प्रति खराब व्यवहार किया। सू ची से इतर इस अल्पसंख्यक तबके ने राज्य व्यवस्था से सशस्त्र संघर्ष का रास्ता चुना। देश में लोकतंत्र की वापसी से तुरंत इनके हक में बेहतरी नहीं आई मगर बेहतरी की सबसे प्रबल आशा जरूर थी। जब इस समुदाय के विद्रोहियों ने बातचीत और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की बजाय सेना की चौकी पर आत्मघाती हमला करना उचित समझा तो सेना ने बदला लिया। बदले की कार्रवाई निर्दोषों का ही नुकसान करती है। इससे भारी पलायन हुआ और पड़ोसी भारत से शरण देने की अपील होने लगी। इस मुद्दे पर भारत सरकार की तटस्थ भूमिका पर बाहर से सवाल उठता कि देश के भीतर से ही लोग शरणागत रक्षा के धर्म की याद दिलाने लगे।

तुरत-फुरत के समाधान सुझाने के बजाय हम स्थायी हल की बात क्यों नहीं करते! इस संकट का हल किसी लोकतंत्र के लाखों लोगों को किसी और देश का शरणार्थी बना देने में नहीं हो सकता। भारत जैसेदक्षिण एशिया के तमाम देश एका बना कर सू ची पर इस बात के लिए दबाव बना सकते हैं कि वे  सर्वशक्तिमान नेता के बतौर देश का माहौल अल्पसंख्यक समुदाय के लिए अनुकूल करें। रोहिंग्याओं को बुलाने का लॉलीपॉप दिखाने की बजाय उन्हें अपने देश में संगठित होकर संघर्ष करने की कड़वी गोली देना अधिक उचित है। तमाम देशों में संविधान प्रदत्त अधिकारों के बावजूद एक वर्ग तक व्यवहार रूप में वे नहीं पहुंचते। उन्हें हासिल करने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है।
म्यांमार में अब लोकतंत्र है और बात कहने का यही सबसे बेहतर जरिया भी है। रोहिंग्या कोई एकलौती उत्पीड़ित कौम नहीं हैं। उन्हें अपने ही दक्षिण एशियाई पाकिस्तान-बांग्लादेश के हिंदू अल्पसंख्यकों से सीखना चाहिए। समय आ गया है कि रोहिंग्या विद्रोही हथियार डालें और अपने समुदाय का पलायन रोकने के लिए सरकार से शांतिपूर्ण वार्ता करें। आशा है कि अन्य लोकतंत्रों की तरह समय के साथ म्यांमार भी समावेशी होगा और उन्हें उनकी खास जगह देगा।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली
स्वच्छ भारत
स्वच्छ भारत अभियान को तीन साल हो गए हैं। इस दौरान काफी कुछ बदलाव आया है। इससे लगता है कि यह अपने लक्ष्य को जरूर हासिल करेगा बशर्ते दिखावे व कागजी खानापूर्ति से दूर रहे।अनेक बार देखने में आया है कि कोई राजनेता या प्रसिद्ध व्यक्ति टीवी में या चर्चा में आने के लिए हाथ में झाड़ू लेकर साफ जगह की सफाई करते हैं!
स्वच्छ भारत अभियान का ही प्रभाव है कि जिस गंदगी पर हम बात करना पसंद नहीं करते थे आज उस पर चर्चा होती है। साफ-सफाई के प्रति लोगों में जागरूकता लाने में इस अभियान की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
’अनिल नाथ, नागौर, राजस्थान

 

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