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योग और विपस्सना

योग दिवस पर मुझे अपनी तरुणाई के नालंदा-प्रवास की याद आ रही है। भिक्षु द्वय जगदीश कश्यप और धर्मरत्नजी से विपस्सना को जाना-समझा था। बुद्ध के अनुयायी इसे बहुत महत्त्व देते हैं। बुद्ध मानते थे कि मन की उथल-पुथल का शरीर पर प्रभाव पड़ता है। वे मन को दुरुस्त करने की एक विधि बताते हैं। […]

Author June 24, 2015 5:25 PM

योग दिवस पर मुझे अपनी तरुणाई के नालंदा-प्रवास की याद आ रही है। भिक्षु द्वय जगदीश कश्यप और धर्मरत्नजी से विपस्सना को जाना-समझा था। बुद्ध के अनुयायी इसे बहुत महत्त्व देते हैं। बुद्ध मानते थे कि मन की उथल-पुथल का शरीर पर प्रभाव पड़ता है। वे मन को दुरुस्त करने की एक विधि बताते हैं। यही विपस्सना है। मन में ही विकार उठते हैं, जैसे क्रोध या अन्य बुरे भाव। क्रोध एक उग्र विकार है लिहाजा, इसे ही उदाहरण के रूप में लें। क्रोध उभरने से सांस अनियमित हो जाती है और इस अनियमन से शरीर की जीव-रासायनिक क्रिया में अस्वाभाविक हलचल मच जाती है। मुहावरे में हम इसे खून खौलना कह सकते हैं। शरीर की यह अस्वाभाविक क्रिया हमारा चित्त और स्वास्थ्य दोनों खराब करती है। जीवन में यह लगातार होता रहे तो हम विनाश की ओर बढ़ते हैं।

बुद्ध सांसों पर पहरेदारी की बात करते हैं। इसे आना-पान सति कहा जाता है। जब हम सांसों की विसंगति को ठीक करते हैं, उसे लय में लाते हैं तब हमें शरीर के अन्य हिस्सों में आए विकारों को देखने में सुविधा होती है। यही विपस्सना है। पश्य अर्थात देखना, विपश्य अर्थात विशिष्ट रूप से देखना। अपने विकारों को देख लेने भर से उसका अवलंब- यानी आधार ध्वस्त हो जाता है। इसके साथ विकार भी समाप्त होने लगते हैं, क्रोध शमित होने लगता है।
आना-पान सति और विपस्सना पहला और दूसरा पायदान हैं। यह एक विज्ञान है। इसके अभ्यास से व्यक्ति विकार मुक्त होकर सद्चित्त युक्त होता है। ऐसे लोगों से बना समाज सच्चे अर्थों में धार्मिक बनता है- तन मन से विकार मुक्त स्वस्थ समाज।

योग विपस्सना का उलट है, विपरीत है। यह स्वस्थ शरीर से स्वस्थ मन की ओर बढ़ता है। बुद्ध स्वस्थ मन से स्वस्थ शरीर की ओर बढ़ते हैं। वैज्ञानिक विधि कौन है यह आप तय करेंगे। बाबा रामदेव अगर योग की जगह विपस्सना करते तो व्यापार की माया में नहीं बंधते। प्रधानमंत्री मोदी यदि आना-पान सति से विपस्सना की ओर बढ़ते तब कई विवादों से दूर रहते।

इस विपस्सना के लिए किसी सांप्रदायिक मंत्र की भी जरूरत नहीं होती। यहां तो बस दीर्घ मौन की जरूरत है। योग दिवस के साथ लोग विपस्सना की चर्चा भी कर सकें, तो मैं इसे एक अच्छी शुरुआत मानूंगा।
प्रेमकुमार मणि, पटना

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