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यात्रा का हासिल

जब भी प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर जाते हैं तो ऐसा प्रचारित होता है मानो जग जीत कर आए हों। अमेरिका यात्रा का रिकार्डतोड़ हो-हल्ला, उसके बाद राष्ट्रपति बराक ओबामा के दिल्ली आगमन पर वही अतिरेकपूर्ण मित्रता का प्रदर्शन। इस सबका सकारात्मक प्रभाव क्या हुआ यह तो मोदीजी का प्रचारतंत्र ही जानता होगा, अलबत्ता इतना जगजाहिर […]

Author May 21, 2015 8:17 AM

जब भी प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर जाते हैं तो ऐसा प्रचारित होता है मानो जग जीत कर आए हों। अमेरिका यात्रा का रिकार्डतोड़ हो-हल्ला, उसके बाद राष्ट्रपति बराक ओबामा के दिल्ली आगमन पर वही अतिरेकपूर्ण मित्रता का प्रदर्शन। इस सबका सकारात्मक प्रभाव क्या हुआ यह तो मोदीजी का प्रचारतंत्र ही जानता होगा, अलबत्ता इतना जगजाहिर है कि ओबामा जाते-जाते कह गए कि विकास के लिए सांप्रदायिक सद्भाव जरूरी है। इशारे को और स्पष्ट करते हुए बाद में साफ कहा कि भारत में सांप्रदायिक सद््भाव के मामले में जो स्थिति है उसे देखकर गांधीजी होते तो स्तब्ध रह जाते। अमेरिका से ‘मजबूत’ हुए संबंधों का अंदाज इसी से लगा सकते हैं कि परंपराओं को तोड़ते हुए हमारे प्रधानमंत्री अमेरिका के राष्ट्रपति की अगवानी करने स्वयं हवाई अड््डे पहुंच गए जबकि हमारे प्रधानमंत्री की अगवानी करने अमेरिका का अदना-सा राजनेता तो क्या, कोई वरिष्ठ नौकरशाह भी नहीं होता। जहां विदेश मामले में थोड़ा कहा बहुत समझना होता है, वहीं हमारे मोदीजी के बहुत कहे को थोड़ा ही समझना होता है।

अब हाल की चीन यात्रा में फिर वही अतिरेकपूर्ण प्रचार। जबकि हकीकत यह है कि चीन को भी भारत का बाजार चाहिए। इस संबंध में आकलन यह होना चाहिए कि चीन से हमारा निर्यात अधिक होगा या आयात? फिलहाल तो इस मामले में चीन का ही पलड़ा भारी नजर आता है। चीन के हित में होने वाले वाणिज्यिक करार के अलावा भारत के हित में कोई उल्लेखनीय पहल तो होने से रही। देश की सीमाओं की बात जिस हल्के-फुलके ढंग से टरका दी गई है वह परिपक्व राजनेता की भाषा तो नहीं कही जा सकती। दलाई लामा और तिब्बत को लेकर चीन की नाराजगी में क्या कोई फर्क आएगा? पाकिस्तान को उदारतापूर्वक सहायता देना भारत के परिपे्रक्ष्य में किस तरह देखा जाए? भारत के प्रधानमंत्री की यात्रा के समय चीन के सरकारी टीवी चैनल पर भारत का विवादित नक्शा दिखाना, जिसमें अरुणाचल को भारत हिस्सा ही नहीं माना। इसी तरह चीन पाक अधिकृत कश्मीर को भी भारत का हिस्सा नहीं मानता। नेपाल से भारत की निकटता भी चीन को खटकती है। इस तरह के मुद्दे बने रहें तो भी हम सफलता और कामयाबी के ढोल कैसे पीट सकते हैं?

हमारे प्रधानमंत्री को कोई भला कैसे समझा सकता है कि विदेशी नेता राजनीति के मामले में कुछ गंभीरता की दरकार रखते हैं। चीनियों के साथ झूला झूलना और सेल्फी के बचकाना खेल बहुत ज्यादा मायने नहीं रखते। प्रधानमंत्रीजी, जब आप उनके साथ झूला झूल रहे थे तब उनके सैनिक हमारी सीमाओं का अतिक्रमण कर गोलीबारी करके एक संदेश दे रहे थे। जब आप सेल्फी-सेल्फी खेल रहे थे तब उनका टीवी भारत का विवादित नक्शा दुनिया को दिखा रहा था। राजनय के मामले को ट्वंटी-ट्वंटी की तरह नहीं टैस्ट मैच के अंदाज में खेलना होगा जनाब!
श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल

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