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प्रकृति की पाठशाला

मनुष्य प्रकृति के बीच जन्म लेता है और प्रकृति ही उसे पुन: रचती है। इसीलिए प्रकृति बार-बार अपनी ओर मनुष्य को खींचती रही है। आप किसी भी किनारे पर हों, किसी भी वय में हों, प्रकृति के साथ एक रिश्ता तो बन ही जाता है। पर अक्सर यह देखने में आता है कि विकास की […]

Author Updated: July 6, 2015 5:28 PM

मनुष्य प्रकृति के बीच जन्म लेता है और प्रकृति ही उसे पुन: रचती है। इसीलिए प्रकृति बार-बार अपनी ओर मनुष्य को खींचती रही है। आप किसी भी किनारे पर हों, किसी भी वय में हों, प्रकृति के साथ एक रिश्ता तो बन ही जाता है। पर अक्सर यह देखने में आता है कि विकास की भूमि पर विचरण करते हुए आदमी भूल जाता है कि वह प्रकृति से ही बना है और जब तक प्रकृति के साथ है तभी तक उसकी सत्ता है, उसे भुला कर वह न तो स्वयं की सत्ता बचा पाएगा और न ही प्राकृतिक सत्ता को समझ पाएगा। इस प्रकृति में मनुष्य की खुशियां और सत्ता दोनों ही छिपी हैं, साथ ही जीवन का रहस्य भी- इसी मनोभूमि पर हम सब जीवन को कुछ समझ पाने में सफल होते हैं। वह हमारे जीवन की पाठशाला है।

यह हम पर है कि हम जीवन के शोरगुल में कितना प्रकृति की, कितना मन की, कितना जीवन की धड़कनों को सुनते हैं? अगर नहीं सुनेंगे तो कहां टिक पाएंगे? चाहे जितनी व्यवस्था हो, जब देव जाति ही प्रकृति के आगे एक पल भी नहीं टिक सकी, सब कुछ पानी के बुलबुले की तरह खत्म हो गया। आज सबसे जरूरी बात यह है कि हम प्रकृति की हर आवाज को सुनें, ध्यान दें। जीवन अपनी सहजता और सुंदरता के साथ हमारे पास होगा। प्रयाग शुक्ल ने ‘मोगरे में घोंसला’ (3 जुलाई) में सही लिखा है कि ‘प्रकृति सचमुच कभी निराश नहीं करती है। उसमें कुछ न कुछ देखने-बताने को रहता है। वह हर पल हम सबसे संवाद करती है, जीवन से जोड़ती है, रहस्य से साक्षात्कार कराती है।’ यहां पूरे जीवन का विस्तार और पाठ खुला होता है। इसे देखने-समझने की जरूरत है।
विवेक कुमार मिश्र, कोटा

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