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आलोचना से परहेज

हाल ही में आइआइटी मद्रास के प्रबंधन का छात्रों द्वारा चलाए जा रहे ‘आंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल’ पर लगाया गया प्रतिबंध विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुंह पर तमाचा है। यह प्रतिबंध प्रधानमंत्री के खिलाफ नफरत भड़काने की कोशिश करने के आरोप में लगाया है। एक अज्ञात व्यक्ति की मानव संसाधन विकास मंत्रालय को […]

Author June 3, 2015 5:55 PM

हाल ही में आइआइटी मद्रास के प्रबंधन का छात्रों द्वारा चलाए जा रहे ‘आंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल’ पर लगाया गया प्रतिबंध विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुंह पर तमाचा है। यह प्रतिबंध प्रधानमंत्री के खिलाफ नफरत भड़काने की कोशिश करने के आरोप में लगाया है। एक अज्ञात व्यक्ति की मानव संसाधन विकास मंत्रालय को लिखी गई चिट्ठी के बाद यह कदम उठाया गया है। आंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल के जिस पर्चे का हवाला देते हुए बताया जा रहा है कि छात्रों का यह समूह प्रधानमंत्री के खिलाफ नफरत को हवा दे रहा है, अगर एक बार उस पर्चे की विषय वस्तु पढ़ ली जाए तो साफ हो जाता है कि प्रतिबंध नफरत फैलाने के लिए नहीं बल्कि इस सरकार की आर्थिक-राजनीतिक नीतियों की आलोचना करने के लिए लगाया गया है।

सबसे जरूरी और अहम बात यह है कि लोकतंत्र में आलोचना, वाद विवाद और अपनी बात कहने का हक सबको इस देश का संविधान देता है, तो फिर क्यों विद्यार्थियों से यह हक छीना जा रहा है? सिर्फ इसलिए कि सरकार नहीं चाहती कि देश की युवा पीढ़ी उसके द्वारा जारी किए फतवों (नीतियों) की आलोचना करे? क्या यही हैं वे अच्छे दिन जिनका वादा कर यह पार्टी सत्ता में आई थी? वॉल्तेयर ने बिलकुल ठीक कहा था कि ‘यह जानने के लिए कि तुम पर कौन राज करता है, इसका पता लगा लो कि तुम किसकी आलोचना नहीं कर सकते।’ किस लिहाज से सरकार की नीतियों के बारे में वाद-विवाद करना या आलोचना करना उस सरकार के प्रधानमंत्री के खिलाफ नफरत भड़काना है, यह तो केवल सत्ता में बैठे लोग बता सकते हैं।

ऐसे प्रतिबंध एक तानाशाह की अपने खिलाफ हर उस आवाज को चुप कराने की कोशिश हैं जो उसकी राजनीति पर सवाल खड़ा करती है। मोदी सरकार का यह कोई पहला प्रतिबंध नहीं है। यह सरकार सत्ता में आने के बाद से ही लगातार छात्रों और आम नागरिकों से उनके संवैधानिक हकों को किसी न बहाने छीनती रही है। अगर सरकार को नफरत फैलाने वालों से इतना परहेज है तो पहले वह साध्वी निरंजन ज्योति जैसे लोगों के खिलाफ कोई कदम क्यों नहीं उठाती? भगवा ब्रिगेड, जो कभी लव जिहाद, कभी गोहत्या पर प्रतिबंध या घर वापसी की मुहिम के जरिए देश के लोगों के बीच नफरत के बीज बो रही है, उसके खिलाफ कोई कार्रवाई करने से सरकार क्यों कतराती हैं? क्यों वह आरएसएस, जो अपनी शाखाओं में खुले आम सांप्रदयिक जहर उगलती है, उस पर प्रतिबंध नहीं लगाती?

बात साफ है कि ‘जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे’ की तर्ज पर यह सरकार अब देश की जनता और युवाओं को चेतावनी देना चाहती है कि अगर उनके खिलाफ कुछ भी कहा तो अंजाम अच्छा नहीं होगा। इस सरकार का असली फासीवादी चेहरा सामने आ रहा है। और फासीवाद का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए देश के सभी युवाओं को एक साथ मिलकर अपने अधिकारों के लिए लड़ना होगा।
वारुणी, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

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