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धूमिल सपने

सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हों /दिल पर रख कर हाथ कहिए देश क्या आजाद है? लगभग चार दशक पहले यह सवाल जितना झकझोरता था आज सटीक होते हुए भी उतना परेशान नहीं करता। खासकर शासक वर्ग को तो बिल्कुल भी नहीं, अगर करता होता तो गांवों की बदहाली और शहरों में मलिन […]

Author July 6, 2015 5:30 PM

सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हों /दिल पर रख कर हाथ कहिए देश क्या आजाद है? लगभग चार दशक पहले यह सवाल जितना झकझोरता था आज सटीक होते हुए भी उतना परेशान नहीं करता। खासकर शासक वर्ग को तो बिल्कुल भी नहीं, अगर करता होता तो गांवों की बदहाली और शहरों में मलिन बस्तियों की भरमार के बावजूद स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन की बात भला कैसे कर सकता था? संवेदनाएं इतनी मर जाएंगी कि बहुसंख्यक आबादी को जलालत में रखते हुए चंद लोगों के ऐशो-आराम में ही पूरे देश की दौलत लुटा दी जाएगी, यह बात पचास-साठ के दशक में सोचना मुश्किल था। उस समय सभी को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय दिलाने और समतावादी समाज की स्थापना के सपनों (देश के संविधान की उद्देशिका) में भरोसा कुछ ज्यादा ही था। लेकिन शासक वर्ग की कथनी और करनी के भेद ने संविधान में दिखाए गए सपनों को धूमिल कर दिया। ज्यों-ज्यों शहरों के विकास की गति तीव्र हुई, गांवों के विनाश की गति भी बढ़ती गई।

‘अभाव के गांव’ (18 जून) में रविकांत ने बुंदेलखंड के गांव जगम्मनपुर की जो व्यथा बताई है वह देश के अनेक प्रदेशों के गांवों की कहानी है। झांसी रेलवे स्टेशन का विशाल प्रांगण बुंदेलखंड से पलायन करने वालों से ठसाठस भरा रहता है। दर-दर भटकते हुए अभावग्रस्त लोगों की वह भीड़ गांवों की दारुण दशा दर्शाने के लिए पर्याप्त है। जनकवि अदम गोंडवी ने गांव का परिचय देते हुए कहा- ‘फटे कपड़ों में तन ढांके गुजरता हो जहां कोई / समझ लेना वो पगडंडी अदम के गांव जाती है’। रोजगार के अभाव में गांवों से शहरों में धकेले गए लोग जिस असुरक्षा और परेशानियों में किसी तरह गुजर-बसर करते हैं उसे बयान करते हुए अदम कहते हैं- ‘हम अपना सलीब कांधे पर उठाए हैं/अए शहर के बासिंदो हम गांव से आए हैं’।

आज गांव की तकलीफों को सुनने वाला भी कोई नजर नहीं आता, जिसका एक कारण यह भी है कि सौ में सत्तर आदमी जो नाशाद हैं उनकी पीड़ा को तीस प्रतिशत जो नाशाद नहीं हैं उनकी चकाचौंध का ग्रहण लग गया है। जब भी कहीं गरीबी और अभाव का जिक्र होता है, शहरों की संपन्नता के उदाहरण देकर बात आई गई कर दी जाती है, मानो कहीं कोई कमी हो ही न। अपने स्वार्थ के कारण बहुसंख्यकों की तकलीफ दिखाई ही नहीं देती। लाख टके का सवाल यही है कि बहुसंख्यकों की मजबूरी को मजबूती में कैसे बदला जाए?
श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल

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