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शुचिता के दाग

सवाल है कि जब भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते एक गठबंधन तोड़ा गया तो नए गठबंधन की सरकार में बतौर मंत्री आपराधिक छवि के नेताओं को शामिल क्यों किया गया?

Author August 3, 2017 5:58 AM
बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार व उपमुख्‍यमंत्री सुशील कुमार मोदी। (Source: PTI)

राजनीतिक सुधारों की वकालत करने वाली अग्रणी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के अनुसार हाल ही में गठित जेडीयू-भाजपा गठबंधन की सरकार के पचहत्तर फीसद मंत्रियों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें से नौ मंत्रियों पर गंभीर आपराधिक मामले हैं। नवनिर्मित सरकार के उनतीस में से बाईस मंत्रियों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। पहले के जेडीयू-आरजेडी गठबंधन की सरकार के अट्ठाईस में से उन्नीस मंत्रियों पर आपराधिक मामले चल रहे थे। सोशल मीडिया पर आ रही खबरों के अनुसार उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी पर भी भ्रष्टाचार का मामला दर्ज है। सवाल है कि जब भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते एक गठबंधन तोड़ा गया तो नए गठबंधन की सरकार में बतौर मंत्री आपराधिक छवि के नेताओं को शामिल क्यों किया गया?

कोई दल यदि कहे कि वह भ्रष्टाचार से खिलाफ है तो यह आज सबसे बड़ा झूठ लगता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण लोकपाल है जिसके गठन के बाबत 2013 में कानून बन चुका है लेकिन चार वर्ष हो गए अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हुई है। जब बिहार में भ्रष्टाचार के नाम पर सत्ता परिवर्तन हो रहा था ठीक उसी वक्त केंद्र सरकार पनामा पेपर लीक्स में सामने आए देश के लोगों पर चुप्पी साधे बैठी थी। जहां पाकिस्तान और आइसलैंड जैसे देशों के प्रधानमंत्रियों को पनामा पेपर में नाम आने पर अपना पद गंवाना पड़ा वहीं हमारे देश के सियासतदान इस मुद्दे पर अपने होंठ सिले रहे। शायद इसलिए कि इसमें अडानी के बड़े भाई, अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन जैसे नाम थे, किसी विपक्षी दल के नेताओं के नाम नहीं थे। यह कैसी अंतरात्मा की आवाज है जो सिर्फ विपक्षी दलों के भ्रष्टाचार पर चीखती है वह भी वहां जहां खुद के हित सधते हों?

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मध्यप्रदेश में नित नए घोटालों का खुलासा हो रहा है चाहे वह वन विभाग की जमीन पर कब्जे का मामला हो या सरकारी पैसे पर परिवार को विदेश घुमाने का। इन पर मीडिया में कोई बवाल नहीं मचता। व्यापम घोटाले में तो अब तक दर्जनों लोग अपनी जान भी गंवा बैठे हैं पर न किसी की अंतरात्मा जागी और न किसी ने एकजुट होकर भ्रष्टाचार से लड़ने की अपील की।जब अरबों रुपए का कर्ज दबाए बैठे उद्योगपतियों का नाम सार्वजनिक करने की बात होती है तो सरकार इनकार कर देती है मगर गरीबों के घरों के बाहर ‘मैं गरीब हूं’ का बोर्ड लगवाने में इसे कोई आपत्ति नहीं होती। दोहरे चरित्र और चेहरे वाली वर्तमान राजनीति में अगर कुछ बचा है तो वह है सत्ता का लालच और स्वार्थसिद्धि। राजनीति के हम्माम में सब नंगे हैं और एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं। यह अलग बात है कि विपक्ष आजकल विपक्ष नहीं रहा, अब तो सत्ता और विपक्ष एक ही है।
’अश्वनी राघव ‘रामेन्दु’, उत्तमनगर, नई दिल्ली

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