किसानों की खातिर

अप्रैल महीने की प्रतीक्षा हमारे देश के किसान बड़ी बेसब्री से इस उम्मीद में करते हैं कि उनकी फसलें खलिहान से घर तक पहुंचेंगी। लेकिन इस साल रबी की फसल कटते ही शादी-ब्याह का आयोजन मंगलपूर्वक करने की आस लिए हमारे अन्नदाताओं के घर में मातम छाया हुआ है। कारण है बेमौसमी बारिश-तूफान जैसी प्राकृतिक […]

अप्रैल महीने की प्रतीक्षा हमारे देश के किसान बड़ी बेसब्री से इस उम्मीद में करते हैं कि उनकी फसलें खलिहान से घर तक पहुंचेंगी। लेकिन इस साल रबी की फसल कटते ही शादी-ब्याह का आयोजन मंगलपूर्वक करने की आस लिए हमारे अन्नदाताओं के घर में मातम छाया हुआ है। कारण है बेमौसमी बारिश-तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाएं। इन आपदाओं ने उन्हें इस कदर बेहाल कर रखा है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अब तक पचास किसानों की मौत हो चुकी है। 1995 से अब तक देश में दो लाख किसानों की मौत हो चुकी है।

आंकड़े बताते हैं कि इस साल गेहूं की लगभग ग्यारह हजार करोड़ की फसल बरबाद हुई है। इस बेमौसम बारिश, तूफान के कारण उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र जैसे राज्य प्रभावित हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दस लाख हेक्टेयर गेहूं की फसल अकेले उत्तर प्रदेश में बर्बाद हुई है। वहीं महाराष्ट्र में गेहूं के साथ आलू की फसल भी बर्बाद हो चुकी है। जहां एक तरफ हमारे देश के किसान अपनी जीवन लीला समाप्त कर रहे हैं तो कुछ किसानों की मौत फसलों की बर्बादी के कारण सदमे से हुई है। आनन-फानन में सरकार मुआवजे का एलान कर चुकी है। लागत से डेढ़ गुना मुआवजा देने की सरकारी घोषणा हुई है।

इस परिदृश्य ने अनेक सवालों को जन्म देकर हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है। आखिर देश के अन्नदाता स्वयं अन्न के लिए मोहताज क्यों हो रहे हैं। भूख, गरीबी का दंश झेलते-झेलते अकाल मौत मरने के लिए किसान अभिशप्त क्यों हैं? उनके बदन पर कपड़े तक नहीं हैं। रात-दिन हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले इन किसानों को दो जून की रोटी नहीं मिल रही है।

उत्तर प्रदेश के किसानों को गन्ने की कीमत अब तक मिल मालिकों ने नहीं दी है। बिल की पर्ची लेकर किसान इधर-उधर भटक रहे हैं। अब मिल मालिक गन्ने की कीमतों के बदले आधी कीमत पर चीनी लेने के लिए किसानों को मजबूर कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अब तक कभी भी किसानों को कोई मुआवजा नहीं मिला है। सरकार कहती है कि जिन किसानों की तैंतीस फीसद फसलें बर्बाद हुई हैं उन्हें भी मुआवजा मिलेगा। मुआवजा कब तक उन्हें मिलेगा इसका जवाब भविष्य के गर्भ में है।

सवाल है कि आखिर आजादी के 65 वर्ष बाद भी किसान का जीवन लगातार बदहाल क्यों हुआ है। इन सवालों के जवाब खोजते-खोजते मैं व्यथित हो गया और निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि किसानों की खेती के लागत मूल्य में बढ़ोतरी हुई है जबकि समर्थन मूल्य उन्हें फसलें कम दिए जा रहे हैं। हिंदुस्तान में उद्योगपतियों को अपने उत्पादों के मूल्य निर्धारण का अधिकार दिया गया है जबकि किसानों के पास अपनी फसलों के बिक्री मूल्य का अधिकार नहीं है।

खाद, बीज, बिजली आदि के लिए किसानों को सरकारी सहायता का मोहताज रहना होता है और बिक्री मूल्य कम होने के कारण खेती से उन्हें लाभ नहीं मिल पाता। नतीजतन, दिन-रात मेहनत करने वाले ये अन्नदाता अन्न के लिए आकुल-व्याकुल रहते हैं।

कुछ किसानों को आशंका है कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम से खेती योग्य जमीन कहीं सरकार के अधिकार क्षेत्र में न चली जाए। ऐसी स्थिति में देश में अन्न संकट अवश्य पैदा होगा।

आज शहरी जीवन के अभ्यस्त नागरिकों की चाह सिर्फ इतनी है कि गांव के किसान उनके लिए अन्न उपजाएं और देश की सुरक्षा के लिए अपने नौजवान बेटों को भेजें। स्थिति विकराल हो चुकी है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी देन यह है कि किसान का बेटा किसानी नहीं करना चाहता है। गांधीजी कहते थे कि भारत की आत्मा हमारे देश के खेत-खलिहानों में है।

भारत के किसान ही वास्तव में हमारे देवता हैं। हमने अंग्रेजों से मुक्ति पा ली है लेकिन मेरा मानना है कि भारतीय राष्ट्र की मुक्ति तब तक संभव नहीं है जब तक किसानों को समस्याओं और कष्टों से मुक्ति नहीं मिलेगी।
जयपाल सिंह, गुड़मंडी, दिल्ली

 

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