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जब अमेरिका, इंग्लैंड जैसे देशों की कोई प्रतिष्ठित पत्रिका शिक्षण संस्थानों की रैंकिंग जारी करती है तब हमारा प्रबुद्ध वर्ग मातम मनाने लगता है। दुनिया के शीर्ष दो सौ विश्वविद्यालयों में हमारी गणना नहीं है। यह यथार्थ है। पर इस वास्तविकता से बड़ा सवाल है कि दुनिया के मानचित्र से गायब रहने वाले शिक्षण संस्थानों […]

Author April 23, 2015 14:06 pm

जब अमेरिका, इंग्लैंड जैसे देशों की कोई प्रतिष्ठित पत्रिका शिक्षण संस्थानों की रैंकिंग जारी करती है तब हमारा प्रबुद्ध वर्ग मातम मनाने लगता है। दुनिया के शीर्ष दो सौ विश्वविद्यालयों में हमारी गणना नहीं है। यह यथार्थ है। पर इस वास्तविकता से बड़ा सवाल है कि दुनिया के मानचित्र से गायब रहने वाले शिक्षण संस्थानों से निकलने वाली मेधाओं की मांग विश्व की प्रतिष्ठित संस्थानों में क्यों है? नासा से लेकर विश्व की शायद कोई नामचीन संस्था हो जिसमें भारतीय मेधा का डंका न बजता हो। बावजूद इसके दुनिया के शीर्ष संस्थानों में हमारे लिए जगह नहीं है।

दरअसल, स्वामी विवेकानंद का मत इस अंतर-विरोध की स्पष्ट व्याख्या करता है। पाश्चात्य सभ्यता का मेरुदंड यूनान का जीवन दर्शन बाह्य घटनाओं पर केंद्रित रहा है। इसलिए प्रकृति के गूढ़तम रहस्यों का तथ्यात्मक विश्लेषण का आधार प्रयोगात्मक बन गया। परिणाम स्वरूप पाश्चात्य देशों में क्रांतिकारी मशीनों का सूत्रपात विज्ञान के चमत्कार के रूप में सामने आया। जबकि भारतीय जीवन दर्शन इसके ठीक उल्टा रहा है। मैं कौन हूं उसके अनुसंधान का केंद्र बिंदु है। यही कारण रहा कि विद्या और अविद्या के रूप में ज्ञान को दो भागों में बांटा गया। विज्ञान (प्रकृति की जटिलतम रहस्यों की खोज का ज्ञान) अविद्या होने के कारण हमारे ऋषि-मुनियों का झुकाव स्व की खोज (विद्या) की ओर बढ़ गया। वेद, उपनिषद आदि ग्रंथों का निर्माण इसी विद्या के अनुसंधान का परिणाम है।

वास्तव में भारतीयों ने शून्य का आविष्कार नहीं किया। बल्कि स्व की खोज में स्वशन प्रणाली पर अद्भुत पकड़ की क्षमता ने शून्य की सत्ता का बोध कराया। किसे पता था कि आगे चल कर यही शून्य अविद्या के लिए प्राणवायु बन जाएगा। यकीनन विज्ञान आज जिस ऊंचाई पर पहुंचा है, उसमें सबसे बड़ा योगदान शून्य का है। समय के प्रवाह में कालचक्र का पहिया ऐसा घूमा कि पूरी दुनिया में अविद्या का बोलबाला हो गया। यही कारण है कि हमारी शिक्षण संस्थाएं जिन चुनौतियों का सामना कर रही हैं। वह यह नहीं कि उसके पास कौशल नहीं है, बल्कि चुनौती कार्य-बल को प्रशिक्षित करने और इन्हें प्रमाणित करने की उचित प्रणाली का अभाव है।

2012 में फिक्की की एक रिर्पोट के अनुसार, भारत के कार्य-बल संख्या के केवल बीस फीसद को कुछ प्रकार का प्रशिक्षण प्राप्त है। इनमें से ज्यादातर प्रशिक्षित सरकारी नौकरी पाने की हालत में नहीं हैं। अगर प्रशिक्षित व्यक्ति नौकरी के लिए दर-दर की ठोकर खा रहा है तो हमारे शिक्षण संस्थानों की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। अब वक्त आ गया है कि कोरा किताबी ज्ञान बांटने की मानसिकता से शिक्षण संस्थानों को मुक्त किया जाए। इस आलोक में चीन को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। चीन माध्यमिक विद्यालय के छात्रों के औपचारिक कुशल प्रशिक्षण कार्यक्रम के जरिए एक बड़ा विनिर्माण केंद्र बन गया। जिसकी वजह से विश्व बाजार में चीन एक बड़ी ताकत के रूप में उभरा।

मानव संसाधन विकास मंत्री ने क्यूएस यूनिवर्सिटी रैकिंग्स ब्रिक्स 2014 की पहली प्रति प्रधानमंत्री को सौंपी। इसमें शीर्ष दो सौ विश्वविद्यालयों को शामिल किया गया था। शीर्ष दस में से छह संस्थान चीन के थे, जबकि इसमें कोई भारतीय संस्थान जगह बनाने में सफल नहीं रहा। प्रतिक्रिया में प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत आधारित स्वतंत्र रैंकिंग बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि मौजूदा रैंकिंग व्यवस्था का झुकाव पश्चिमी देशों की तरफ है।

पाश्चात्य देश भारतीय मेधा का मजाक उड़ाने का अवसर ढूढ़ते रहते हैं। मंगल मिशन की ऐतिहासिक कामयाबी पर जिस समय भारत जश्न मना रहा था। पाश्चात्य देशों को अच्छा नहीं लगा। अमेरिका के एक प्रतिष्ठित समाचारपत्र ने मंगल मिशन पर कार्टून बना कर खिल्ली उड़ाई। ग्रामीण वेशभूषा में गाय के साथ भारतीय किसान अमेरिका के स्पेस एलिट क्लब का दरवाजा खटखटा रहा है। आखिर पाश्चात्य देश ऐसा कार्टून छाप कर देश-दुनिया को कैसा संदेश देना चाहते हैं। क्या भारत ने कभी नासा की किसी ऐतिहासिक सफलता पर ऐसी हरकत की?
धर्मेंद्र कुमार दुबे, वाराणसी

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