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चौपाल: मुश्किल सफर

मानव समाज को अपनी विकास यात्रा के दौरान विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ये समस्याएं प्राकृतिक भी हो सकती हैं और कृत्रिम भी।

Author Updated: January 7, 2021 10:40 AM
Airप्रदूषण से लोगों को हो रही परेशानी। फाइल फोटो।

प्राकृतिक समस्याओं से पार पाना मनुष्य के लिए इतना आसान नहीं है, लेकिन मनुष्य कृत्रिम समस्याओं का इतना विस्तार कर देता है कि प्रकृति समस्या से बदल कर आपदा का रूप ले लेती है। ऐसी ही एक समस्या है महानगरों का बढ़ता घनघोर यातायात।

आज हम महानगरों या छोटे शहरों के यातायात को केवल परिवहन की दृष्टि से नुकसानदायक नहीं मान सकते हैं। अगर हमने आज की इस समस्या पर गौर नहीं किया तो इसके हमें और हमारी पीढ़ियों को भविष्य में बेहद खतरनाक परिणाम भुगतने होंगे। शहरों में बढ़ता ट्रैफिक आवागमन की सुविधा को तो अवरुद्ध करता ही है, साथ ही यह हमारे जीवन की गति को भी धीमा करता है। वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण को व्यापक स्तर पर बढ़ाता है और इससे दुर्घटनाओं में भी वृद्धि होती है।

इसके अलावा मनुष्य पर मानसिक दबाव भी बढ़ता है। वहीं पेट्रोल-डीजल की अतिरिक्त खपत का भी हमें खमियाजा भुगतना पड़ता है, जिससे चलते कच्चे तेल की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सड़कों पर बढ़ती गाड़ियों की भीड़ केवल मनुष्य के लिए ही आफत नहीं है, बल्कि इसके चलते अन्य जीव-जंतु भी संकट में रहते हैं।

इसके अलावा, यह पैदल राहगीरों के सामने भी एक चुनौती बन कर उभरा है। आज इसी संकट के कारण हम अक्सर सुनते हैं कि किसी तत्कालीन सेवा को सुविधाजनक तरीके से लाभार्थी को प्रदान नहीं कर पाए और इसी कारण हमें कई बार इस समस्या से निपटने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बल को तैनात करना पड़ा।

हमारे शहरों में बेहतर प्रबंधन का अभाव होने के चलते बढ़ता ट्रैफिक केवल हम तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों पर भी दिखता है।

इस समस्या के भी कुछ प्रमुख कारण हैं, मसलन, महानगरों की बढ़ती आबादी, यातायात प्रबंधन के मामले में प्रशासन का उदासीन रवैया, यातायात के नियमों का पालन न करने वाला समाज, व्यापक स्तर पर बिना लाइसेंस वाले लोग भी नगरों में वाहन दौड़ाते नजर आते हैं।

इसलिए राज्य सरकारों को चाहिए कि वह स्थानीय प्रशासन के साथ मिल कर इस समस्या से निपटने के लिए ठोस कदम उठाए। तभी हम आर्थिक, सामाजिक और सतत् विकास के लक्ष्यों को पाने में सफल हो पाएंगे।
’सौरव बुंदेला, भोपाल, मप्र

राजनीति का रास्ता

कोई भी व्यक्ति सियासी पार्टियों में कहने को जनता जनार्दन की सेवा करने, जंग खाई व्यवस्था में बदलाव लाने या फिर देश-समाज का चहुंमुखी विकास करने की गरज से शामिल होता है। मगर पार्टी जमने लगती है तो बंदरबांट शुरू हो जाती है।

जनता की सेवा करना तो दूर, नेतागण अपने लिए मलाईदार पदों और प्रतिष्ठापूर्ण सुविधाओं को बटोरने और उनके लिए लड़ने-भिड़ने या एक दूसरे पर लांछन लगाने पर उतारू हो जाते हैं। शायद राजनीति का मतलब ही अब यह रह गया है कि पहले अपना हित देखो, बाद में जनता की फिक्र करो। पिता को पद मिला हुआ है तो बेटे को भी कुछ चाहिए। पत्नी मंत्री है तो पति के लिए भी कुछ चाहिए। घाटे में बेबस जनता है, जिसे यह सब टुकुर-टुकुर देखना पड़ रहा है।

कुछ पाने के लिए बहुत त्याग करना पड़ता है। घोर तपस्या के बाद ही फल मिलता है। जुम्मा-जुम्मा सात दिन भी नहीं हुए राजनीति में पैर रखे और लगे बड़ा पद ढूंढने। ऐसे पद लोलुपों के बारे में एक शायर की ये पंक्तियां हैं- ‘तू भी फल का दावेदार निकल आया/ बेटा, पहले बाग लगाना पड़ता है।’ जनता सब समझती है।
अगर राजनीति का मतलब फकत अपना हित-साधन है तो फिर राजनेताओं को जनता के आक्रोश को सहने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
’शिबन कृष्ण रैणा, अलवर, राजस्थान

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