ताज़ा खबर
 

चौपालः खतरनाक टिड्डी दल

असल में टिड्डियों के ये दल अरब प्रायद्वीप से पाकिस्तान होते हुए भारत पहुंचे हैं। इससे पहले ये अफ्रीकी देशों में भी तबाही मचा चुके हैं। जो प्रजाति इस वक्त तबाही मचा रही है, इसे ‘डेजर्ट हॉपर’ कहा जाता है।

Author Published on: May 30, 2020 2:29 AM
UP, Grasshopper attack, farmerआसमान में लाखों की संख्या में उड़ते हुए टिड्डे और टिड्डियां किसानों के दुश्मन बनकर आए हैं।

देश में मौजूदा संकट, प्रवासी मजदूरों की समस्या और अंफन तूफान के साथ ही एक और नई मुसीबत सामने है। राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पिछले कुछ दिनों से टिड्डियों ने आतंक मचा रखा है। जयपुर शहर में इन टिड्डियों ने घरों में घुस कर आम जनजीवन मुहाल कर दिया, तो झांसी में इनके खात्मे की ताजा खबरें भी आई हैं। सन 1993 में पिछली बार इनका सबसे बड़ा हमला हुआ था, लेकिन इस बार का हमला उससे भी बड़ा माना जा रहा है।

असल में टिड्डियों के ये दल अरब प्रायद्वीप से पाकिस्तान होते हुए भारत पहुंचे हैं। इससे पहले ये अफ्रीकी देशों में भी तबाही मचा चुके हैं। जो प्रजाति इस वक्त तबाही मचा रही है, इसे ‘डेजर्ट हॉपर’ कहा जाता है। आमतौर पर शांत और अलग-थलग रहने वाली टिड्डियां कई बार झुंड में उग्र हो जाती हैं। इसे वातावरण में हो रहे बदलावों से जोड़ कर भी देखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक एक वर्ग किलोमीटर में फैले दल में करीब चार करोड़ टिड्डियां होती हैं, जो एक दिन में पैंतीस हजार लोगों के पेट भरने भर का भोजन खा जाती हैं।

अरब सागर के पास स्थित अफ्रीकी देशों में इनके हमले काफी देखने को मिलते हैं। इनमें हार्न ऑफ अफ्रीका (सोमालिया, इथियोपिया, एरिट्रिया) के देश शामिल हैं। टिड्डियां हवा के बहाव से अपनी उड़ने की दिशा तय करती हैं, क्योंकि इससे इन्हें उड़ान में मदद मिलती है। गर्मियों के मौसम में पश्चिम दिशा से चलने वाली गर्म हवाएं इन्हें धकेल कर ईरान से पाकिस्तान और फिर भारत ले आती हैं। पहले से ही संकटों से घिरे देश के किसानों के सामने टिड्डियों के हमले से बचना एक चुनौती है। सरकार को जल्द से जल्द इन पर काबू पाने का प्रयास करना चाहिए।
-सूरज बालियान, गोयला, मुजफ्फरनगर

सभ्यता के प्रेरक

अतीत की अगर बात करें तो पृथ्वी पर रहने वालों में आदिवासी समाज का नाम पहले आता है। आज भी उनमें से बहुत सारे लोग जंगलों में रहते हैं, ऐसे गांवों में निवास करते हैं, जहां दूर-दूर तक पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता। बच्चे अपने भविष्य के बारे में नहीं जानते, लेकिन अपने माता-पिता का सम्मान करना जानते हैं। इसके बावजूद इस समाज से कुछ बच्चे आगे आए हैं, जिन्होंने खुद को साबित कर सरकारी संस्थानों में अपनी सम्मानजनक जगह बनाई है। जो हम किताबों में पढ़ते हैं कि हमें कैसे अपने परिवार के साथ रहना चाहिए, कैसे माता-पिता को बच्चों के साथ व्यवहार करना चाहिए, सभ्य और संवेदनशील तरीके से कैसे जीना चाहिए, ये सभी बातें हमें आदिवासी समाज के लोगों में देखने को मिलती हैं।

आज हम अपने माता-पिता को अकेले छोड़ देते हैं, कोई छोटी-सी नौकरी लग जाती है या शादी हो जाती है। पर जनजातीय समाजों में लोग मां-बाप की अंतिम सांस तक सेवा और सम्मान करते हैं, चाहे वे कितने भी बड़े पद पर क्यों न पहुंच जाएं। जो आज यूरोपीय देशों के लोगों में देखा जाता है कि वे आधुनिक विचारों के होते हैं, मां-बाप, भाई-बहन, दोस्त की तरह रहते हैं और हमेशा एक-दूसरे का साथ देते हैं, ऐसा आदिवासी समाज के लोग सदियों से करते आए हैं। भले इन्हें कम पढ़ा-लिखा माना जाए, लेकिन ये लोग पश्चिमी देशों के लोगों से भी आधुनिक और सभ्य सोच के हैं।
-अजीत समुंदर, सतना, मप्र

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 चौपालः भेदभाव की पटरी
2 चौपालः सामूहिकता के बरक्स
3 चौपालः कैसे रहनुमा