नतीजों का दबाव

आज जरूरत है शिक्षा को अंकों की औपचारिकता से ऊपर उठा कर रोजगारमूलक और जीवन में व्यावहारिक रूप से उपयोगी बनाने की। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अर्जित शिक्षा के अनुप्रयोग सिखाएं, तभी शिक्षा की सार्थकता है।

अधिकांश अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों की हिंदी अच्छी नहीं है।

दसवीं और बारहवीं के परीक्षा परिणामों में प्राप्तांकों का प्रतिशत हर नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। क्या यह बुद्धिमता (आइक्यू) के मापन का पैमाना बन गया है? क्या लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पर्याप्त है? क्या महज अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य रह गया है? कहीं अंक और ग्रेड के चक्कर में हम बच्चों से उनका बचपन तो नहीं छीन रहे या उन्हें रट्टू तोता तो नहीं बना रहे? यह भी गौरतलब है कि अधिकांश अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों की हिंदी अच्छी नहीं है।

आज जरूरत है शिक्षा को अंकों की औपचारिकता से ऊपर उठा कर रोजगारमूलक और जीवन में व्यावहारिक रूप से उपयोगी बनाने की। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अर्जित शिक्षा के अनुप्रयोग सिखाएं, तभी शिक्षा की सार्थकता है। प्राचीनतम गुरुकुल प्रणाली में शारीरिक, नैतिक, व्यावहारिक, बौद्धिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और कलात्मक सभी पहलुओं का समावेश रहता था, जिससे विद्यार्थी भावी जीवन की कठिनाइयों से जूझने के लिए तैयार हो जाता था। जबकि वर्तमान में बच्चे थोड़ी-सी भी कठिनाई आने पर खुद को असहज और असुरक्षित महसूस करने लगते हैं और आत्महत्या जैसे कायराना कदम को ही सभी समस्याओं का एकमात्र हल समझ बैठते हैं।
’मोहित सोनी, कुक्षी, जिला-धार

अंक ही सब कुछ नहीं
कुछ ही दिन पहले बोर्ड का परिणाम घोषित हुआ। नतीजे देख कर कुछ छात्र बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं, लेकिन कुछ काफी निराश भी हैं। ऐसे में कम अंक हासिल करने वाले बच्चों पर एक मानसिक दबाव की स्थिति बन गई हैं। वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि उनको क्या करना चाहिए। वे खुद को अपने परिवार पर एक बोझ की तरह महसूस कर रहे हैं। इस मानसिक दवाब की स्थिती में एक छात्र के द्वारा किसी प्रकार के अनुचित कदम को उठाने की आशंका काफी बढ़ जाती हैं। और इस स्थिति में हमारे समाज एवं परिवार दोनों का यह दायित्व बन जाता है कि वे ऐसे छात्रों को समझाएं कि उन्होंने अपनी क्षमता के हिसाब से बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। अगर उनके द्वारा कोई कमी रह भी गई है तो कोई परेशानी की बात नहीं है वे उन्हें आगे की परीक्षाओं में सुधारने का प्रयास करें। यह उनकी अंतिम परीक्षा नहीं है। किसी भी छात्र की परीक्षा का परिणाम उसकी क्षमताओं का परिणाम नहीं होता। इसलिए हमें कभी भी छात्रों पर उनके परिणाम को लेकर मानसिक दवाब नहीं बनाना चाहिए। हमें उनको, उनके बेहतर भविष्य के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। यही हमारे समाज और राष्ट्र के हित में है।
’आकाश मलिक, मुरादाबाद

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