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बेपानी सरकार

देश के कई जिले भयानक सूखे की चपेट में हैं और उसी महाराष्ट्र के तीन क्रिकेट के मैदानों पर, जहां आइपीएल के मैच होने हैं, वहां पिच और घास को भिगोने के लिए एक मैदान पर बीस से तीस हजार लीटर पानी की आपूर्ति की जा रही है।

Author नई दिल्ली | April 12, 2016 1:46 AM
मुंबई का वानखेड़े स्टेडियम की पिच में पानी सींचता ग्राउंडमैन। (Agency)

पानी को लेकर भारत के एक हिस्से महाराष्ट्र में धारा 144 लागू होने की खबरें हैं। महिलाएं और यहां तक कि छोटी-छोटी बच्चियां भी लंबी कतारों में कई-कई घंटे खड़े होकर पानी के टैंकरों की प्रतीक्षा करती हैं और फिर टैंकर आने पर पानी भरने के लिए संघर्ष करती हैं। फिर कई किलोमीटर पैदल चल कर पानी घर ले जाती हैं। सरकार की तरफ से घोषणा की गई है कि थाणे में लगभग साठ घंटे पानी नहीं दिया जाएगा। देश के कई जिले भयानक सूखे की चपेट में हैं और उसी महाराष्ट्र के तीन क्रिकेट के मैदानों पर, जहां आइपीएल के मैच होने हैं, वहां पिच और घास को भिगोने के लिए एक मैदान पर बीस से तीस हजार लीटर पानी की आपूर्ति की जा रही है।

इस तरह, तीन मैदानों पर कुल मिला कर लगभग साठ हजार लीटर पानी मैदानों पर गिराया जा रहा है। मुंबई उच्च न्यायालय ने जब इस पर यह टिप्पणी की कि यह अपराध है और मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन से कहा कि आप आइपीएल के मैच कहीं और आयोजित कराएं, जहां पानी की किल्लत नहीं हो तो फिर वही तर्क दिया गया, जो कुछ समय पहले यमुना किनारे आयोजन करने को लेकर दिया गया था कि सारी तैयारियां हो चुकी हैं और टिकट बिक चुके हैं, पैसा लग चुका है आदि।

इस पर मेरे जैसे क्रिकेट प्रेमी को भी शर्मिंदगी है और इस व्यवस्था पर आक्रोश है कि ये कैसी सत्ता है जो अपने संसाधनों के बंटवारे में तो भेदभाव करती ही है, अपने नागरिकों को प्यास से बिलखते और बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष करते देख कर भी दया नहीं आती। इसी भारत के असंख्य बच्चे पानी को लेकर प्रतिदिन संघर्ष करते हैं और दूसरी तरफ क्रिकेट के उन्माद से लैस नारा लगाने वाले अपने मनोरंजन के लिए मैदान पर हजारों लीटर पानी बहा रहे हैं। जहां ‘भारत माता की जय’ कहने और नहीं कहने को देशभक्ति का मानदंड बनाया जा रहा है, वहीं भयानक सूखे से निजात दिलाने के लिए कदम उठाने में सरकारें पूरी तरह से विफल हैं। जबकि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने पिछले साल सितंबर में ही सूखे को लेकर आशंका व्यक्त की थी। (विपुल प्रकर्ष, इलाहाबाद)
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दिखावे के नारे
क्या सिर्फ ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाने से ही राष्ट्रभक्ति साबित की जा सकती है? क्या इस देश के लोगों ने हमेशा संकट या चुनौती के समय में एकजुट होकर अपने देशप्रेम का प्रमाण नहीं दिया है? बुजुर्गों से सुना है कि चीन युद्ध के समय नेहरूजी के आह्वान पर करोड़ों लोगों ने देश के लिए अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार गहने-जेवर तक दान में दे दिया था।
इसी प्रकार खाद्यान्न संकट को देखते हुए जब दिवंगत लालबहादुर शास्त्री ने लोगों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की तो भारी संख्या में लोगों ने इसे अपने जीवन-शैली का हिस्सा ही बना लिया था, बिना किसी नारेबाजी के। क्या यह राष्ट्रभक्ति नहीं थी? आजादी के संघर्ष के दौरान शहीदों ने अलग-अलग तरह के नारे लगाए थे। आज भी प्राकृतिक आपदाओं और आतंकवादी घटनाओं की स्थिति में लोग धर्म, क्षेत्र, जाति, भाषा आदि के भेदभाव को भूल कर एक साथ मदद के लिए खड़े हो जाते हैं। उस वक्त तो किसी नारे की जरूरत ही महसूस नहीं होती।

इसलिए कुछ लोगों का यह कहना कि केवल ‘भारत माता की जय’ कहने से ही राष्ट्रभक्ति प्रमाणित होगी, उचित नहीं है। इसके विरोध में खड़े होकर उन्मादपूर्ण बयान देने वाले ओवैसी हों या फिर समर्थन में बेतुके बोल बोलने वाले फड़णवीस और बाबा रामदेव, दोनों तरह के लोग देश को नुकसान पहुंचाने का ही काम कर रहे हैं। इस तरह के उत्तेजनापूर्ण बयानों से कुछ हासिल नहीं होगा, बल्कि इससे देश में शांति और भाईचारे का माहौल खराब होता है और जो देशहित में नहीं हो, उससे बचना चाहिए। देश के प्रति उत्तरदायित्व का बोध और कर्तव्य-पालन ही वास्तव में राष्ट्रीयता है और आज इसी भावना के निर्माण की आवश्यकता है। नारा लगा कर हम अपनी भावना का प्रदर्शन तो कर सकते हैं, लेकिन अन्य लोगों में उस भावना को जगा नहीं सकते। राष्ट्रभक्ति का संबंध तो हृदय से है। इसलिए समझना होगा कि महज कोई खास नारा लगाने भर कोई देशभक्त नहीं हो जाता और न नहीं कहने से देशद्रोही। (समरेंद्र कुमार, दिल्ली)
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विरोध की कीमत
बस्तर में ‘सामाजिक एकता मंच’ के लोगों ने लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया के खिलाफ नारे लगाए। जबकि वे कई सालों से आदिवासियों के लिए काम करती आ रही हैं। उनके रिसर्च का विषय भी मध्य बिहार में नक्सली आंदोलन था। तो आखिर उनका इस तरह विरोध क्यों हुआ? दरअसल, अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज की पत्नी बेला भाटिया ने अपने एक लेख में आदिवासी महिलाओं के खिलाफ हुई यौन हिंसा के मामलों को लेकर लगातार लिख रही थीं और जमीनी संघर्ष भी कर रही थीं। शायद इसी वजह से उन्हें निशाना बनाया गया।

गौरतलब है कि अक्तूबर, 2015 में बीजापुर के दो गांवों में सामूहिक बलात्कार और फिर सुकमा में यौन हिंसा की खबर आई। बीजापुर के जिला मजिस्ट्रेट के सामने गवाहों ने कहा था कि इस घटना में पुलिस और सुरक्षाकर्मी शामिल थे। भारत के तमाम दलों ने भी अपने-अपने तरीके से जांच की थी। आज संघर्ष की मिसाल बन चुकी सोरी सोनी ने जेल में मिली यातानाओं का जिक्र किया। अब सवाल यह है क्या महिलाएं आवाज नहीं उठाएं? सुरक्षा बलों द्वारा यौन हिंसा की घटना भारत में कई बार वाद-विवाद का कारण भी बना, लेकिन समस्या जस-की-तस बनी हुई है।
(नीशू त्यागी) जेआइएमएमसी कॉलेज, नोएडा
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आखिरी रास्ता
संभव है कि ‘आत्महत्या’ को कुछ लोग हार या कायरता का परिचायक मानें और उसे कठिनाइयों से मुंह मोड़ने वाला कोई काम कहें। कुछ लोगों की नजर में यह किसी मुश्किल परिस्थिति से बचने का आसान तरीका भी हो सकता है। लेकिन मेरा मानना है कि अपने जीवन को खत्म करना किसी भी इंसान की जिंदगी का सबसे कठिन फैसला होता है। आत्महत्या को किसी भी तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता, पर यह समझने की जरूरत है कि अगर एक इंसान इस खूबसूरत जिंदगी के बजाय मौत को चुनता है तो बेशक उसके पीछे कोई न कोई बड़ा कारण होता है जो शायद दूसरों के लिए अहमियत न रखता हो। (उत्कर्ष सिंह, दिल्ली)

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