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नेट के सहारे

आज के जिस दौर में इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है, देखा जाए तो इसी दौर में इंटरनेट ने राजनीति में भी बड़ा बदलाव किया था।

Author नई दिल्ली | April 21, 2016 2:07 AM
(चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।)

सुबह जागने से लेकर रात को सोने तक इंसान की जिंदगी का अहम हिस्सा बना इंटरनेट अब सरकार के लिए घबराहट का सबब बन रहा है। आंदोलन हों या बोर्ड परीक्षाएं, सरकार धारा 144 लगाने के साथ सबसे पहले इंटरनेट और फोन सेवा को बंद कर देती है। हाल ही में कश्मीर में हुए बवाल के बाद वहां इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई। गुजरात में पाटीदार आंदोलन के मद्देनजर इंटरनेट पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हालांकि इससे पहले पिछले साल अगस्त में भी वहां इंटरनेट सेवा रोक दी गई थी। आंदोलनकारियों और पुलिस की झड़प के वीडियो शहर में इंटरनेट पर वायरल न हो पाएं इसलिए यह कदम उठाया जाता है।

सरकार जहां इंटरनेट पर पाबंदी लगा कर वाहवाही लूटती है कि इससे उसने राज्य का माहौल खराब होने से बचा लिया वहीं अगर बारीकी से देखें तो इंटरेनट सेवा बंद करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। इससे देश की साख को नुकसान पहुंचता है। आज जैसे जिंदा रहने के लिए हवा और पानी जरूरत है ठीक उसी प्रकार इंटरनेट की भी इंसानी जिंदगी में कदम-कदम पर आवश्यकता बढ़ी है। सोशल मीडिया का विस्तार कुछ ऐसा हुआ है कि कोई भी कहीं बैठा अभिव्यक्ति की आजादी का लाभ उठाते हुए किसी भी विषय पर अपने विचार लिख सकता है और लोगों तक पहुंचा सकता है। सरकार को डर इसी बात से है कि अगर आंदोलन के दौरान इंटरनेट पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया तो इससे अफवाहें फैलेंगी और स्थिति भी नियंत्रण से बाहर होगी। सोशल मीडिया का राजनीतिकरण होने के कारण उसके विरुद्ध कार्रवाई नहीं की जाती क्योंकि देश में कोई भी ऐसी चीज नहीं बची जिसका राजनीतिकरण न हुआ हो या फिर किया न जा सके।

आज के जिस दौर में इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है, देखा जाए तो इसी दौर में इंटरनेट ने राजनीति में भी बड़ा बदलाव किया था। लोकसभा चुनावों के दौरान सोशल मीडिया का जम कर इस्तेमाल हुआ जिसने एक ‘चाय वाले’ को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया। दरअसल, इंटरनेट का महत्त्व समझना सरकार और जनता के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि इसी के माध्यम से कश्मीर में हालात सामान्य हुए और सेना पर लगा दाग भी मिटा। जैसे ही हंदवाड़ा की घटना में युवती का वीडियो सोशल मीडिया में आया तो वह सरकार के पक्ष में बयान साबित हुआ। इससे सेना कश्मीर में हो रही किरकिरी से बच गई क्योंकि जिस तरह से अफवाह फैलाई गई थी उससे भारतीय सेना को शर्मिंदा होना पड़ रहा था।

राजनीतिक दल अपने ही पक्ष में विचार पोस्ट करते हैं जिससे विपक्ष द्वारा किया जाने वाला कमेंट सोशल मीडिया में बवाल बन जाता है। जरूरत है, सभी को समझने की कि इंटरनेट देश के विकास के लिए जरूरी है। इसका गलत इस्तेमाल न किया जाए। अगर पुलिस भी इंटरनेट सेवा का इस्तेमाल कर आंदोलनों और बंद के दौरान अपील करे तो इसका सकारात्मक इस्तेमाल होगा। किसी भी चीज पर प्रतिबंध लगाना और वह भी उस पर जो जनता से सीधे तौर पर जुड़ी हो, उससे हालात पर काबू नहीं पाया जाता बल्कि उनके बिगड़ने के संभावनाएं बढ़ जाती हैं। (प्रकाश फुलारा, दिल्ली)
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आंदोलन का रास्ता
गुजरात के आरक्षण आंदोलन में हिंसा की पुनरावृत्ति चिंताजनक है। एक स्वस्थ और परिपक्व लोकतंत्र के अनुरूप अपनी मांगों के प्रति ध्यानाकर्षण के लिए आंदोलनकारियों को रास्ता रोको, रेल रोको, जनधन और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और विरोध प्रकट करने के पुतला दहन, चूड़िया भेंट करने, अंडे, टमाटर, जूते फेंकने जैसे तरीकों को छोड़ प्रतिरोध के नए तरीके खोजने चाहिए। इसके साथ ही और सरकारों और प्रशासनिक अधिकारियों को झूठे आश्वासनों से आंदोलन स्थगित कराने, आंदोलनों का दमन करने, कुचलने की प्रवृत्तियों को त्याग कर संवाद से सार्थक हल खोजने की प्रतिबद्धता दर्शानी होगी। (सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर)
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विरोध के बजाय
दिल्ली सरकार के ‘सम-विषम’ योजना लागू करने के फैसले की चर्चा भारत और भारत से बाहर भी हो रही है। प्रथम पारी में यह फार्मूला काफी सफल रहा था और जनता को जाम से राहत के साथ-साथ खुली साफ हवा में सांस लेने का अवसर मिला था। इस सफलता को देखते हुए दिल्ली सरकार ने दुबारा इसे लागू करने का फैसला किया। जनता ने इसका खुले दिल से स्वागत किया है लेकिन विपक्ष और साफ हो चुकी कांग्रेस सिर्फ एक ही माला का जाप कर रहे हैं- विरोध और विरोध। योजना सफल है तो सोचने की बात है कि विरोध किसका हो रहा है?

किसी ऐसी योजना का विरोध करना जो देश और जनता दोनों के लिए सही नहीं है, वह समझा जा सकता है। पर एक सफल योजना का विरोध करना हमारे विपक्ष की नकारात्मक मानसिकता को दर्शाता है। यह जनता को संदेश देता है कि जैसे वह अपने लिए अच्छी और ईमानदार सरकार चुनती है वैसे ही अपने लिए समझदार विपक्ष का चुना जाना भी जरूरी है। (दीपक, शांति मोहल्ला, दिल्ली)
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बिगड़ैल रईसजादे
अखबारों में आएदिन सड़क दुर्घटना की खबरें छपती हैं जिनमें तेज रफ्तार वाली महंगी गाड़ियों से लोगों को कुचलना आम हो चला है। कुछ दिन पहले ही एक बीएमडब्लू कार से युवक को कुचला गया था। इसके बाद कुछ मनचलों ने फिर ऐसी ही दुर्घटना को अंजाम दिया।

इस तरह के मामलों में साफ तौर पर अभिभावकों की लापरवाही नजर आती है। दौलत और शराब के नशे में चूर युवक रौब गांठने के लिए बेपरवाह होकर महंगी गड़ियों का लुत्फ उठाते हैं। उनके लिए सड़क पर चलने वाले व्यक्ति की कोई कीमत नहीं होती। अभिभावक भी मामला दबाने में लग जाते हैं। रही बात कानून की, तो हम सब वाकिफ हैं कि जो व्यक्ति बीएमडब्ल्यू चला रहा है और पिस्टल रखता है, उसके लिए कोर्ट-कचहरी का चक्कर कोई ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। इस तरह के मामलों में जमीनी स्तर पर सुधार के लिए सामाजिक जागरूकता की जरूरत है। लोगों को चाहिए कि अपने बच्चों को दूसरों की जिंदगी की भी अहमियत समझाएं। उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंपने से पहले कुछ नौतिक शिक्षा भी दें ताकि वे किसी की जिंदगी से खिलवाड़ न करें। (अंकित श्रीवास्तव, नोएडा)

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