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महंगाई का सबक

बढ़ती पेट्रोल-डीजल की कीमतों ने आग में घी का काम किया है, जिसका सीधा प्रभाव आम आदमी की थाली पर देखने को मिल रहा है।

सांकेतिक फोटो।

बढ़ती महंगाई के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को संयुक्त रूप से जिम्मेदार माना जा रहा है और ऐसा है भी। रूस यूक्रेन युद्ध के कारण पेट्रोल डीजल की कीमतें आसमान को छू रही हैं, ऐसे में प्रतिबंधों के चलते रूस को होने वाले हमारे निर्यात में बेहद कमी दर्ज की गई है। दूसरी ओर, रूस से होने वाले आयात में कई गुना वृद्धि दर्ज की जा रही है। यानी हमारी विदेशी मुद्रा रूस को जा तो रही है, पर वहां से आ नहीं रही है।

बढ़ती पेट्रोल-डीजल की कीमतों ने आग में घी का काम किया है, जिसका सीधा प्रभाव आम आदमी की थाली पर देखने को मिल रहा है। र्इंधन के दाम बढ़ने से माल ढुलाई महंगी हो गई, जिसके कारण रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले सामान की कीमतों में बेहताश वृद्धि हुई है। अप्रैल में खुदरा महंगाई दर 7.8 फीसद तक पहुंच गई, जो पिछले आठ वर्षों में सबसे अधिक है।

आम आदमी की स्थिति आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया जैसी हो गई है। ऐसी स्थिति में अक्सर सरकारों के पास एक बहाना होता है कि युद्ध या महामारी के कारण महंगाई बढ़ना स्वाभाविक है। पर क्या इतनी महंगाई बढ़ना कि जिसमें कोई सामान साठ फीसद तक महंगा हो जाए? आम आदमी सोचने पर मजबूर हो जाता है कि हमारी आर्थिक आपातकाल के लिए क्या योजनाएं और प्राथमिकताएं हैं? क्या ऐसे आपातकाल में आम आदमी को भूखा मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा? आज भी हमारे पास ऐसी योजनाओं और कार्यक्रमों का अभाव है, जिसमें ऐसी आकस्मिक और आपातकालीन स्थितियों में देश की जनता को बढ़ती कीमतों की मार से कुछ राहत दे सके।

पेट्रोल, डीजल पर करों की कटौती के मामले में राज्य सरकारें और केंद्र सरकार आमने सामने हैं। कोई भी अपना हिस्सा नहीं छोड़ना चाहता है। इस खींचतान में पिस रहा है आम आदमी। राज्य सरकारों को अपनी जनता के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है। पेट्रोल, डीजल पर लगने वाले वैट को कुछ कम करने से अगर जनता को बढ़ती महंगाई से राहत मिल सकती है, तो आकस्मिक तौर पर यह कदम उठाना ही चाहिए। केंद्र सरकार को भी राज्य सरकारों को यथासंभव आर्थिक मदद करनी होगी ताकि राज्य सरकारें र्इंधन के बढ़ते दामों को कम करने के लिए प्रोत्साहित हों।
राजेंद्र कुमार शर्मा, रेवाड़ी, हरियाणा

भ्रष्टाचार की जड़ें

देश में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी होती जा रही हैं। आजादी के एक दशक बाद ही देश भ्रष्टाचार की दलदल में धंसा नजर आ रहा था। समय के साथ भ्रष्टाचार का जाल और फैलता चला गया और आम जनता भ्रष्टाचार को अपनी नियति मान चुकी है। आज भ्रष्टाचार कई रूपों में व्याप्त हो चुका है, जैसे रिश्वत, काला धन, काला बाजारी, अधिक दाम बढ़ाना, सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग आदि। सार्वजनिक क्षेत्र, पुलिस और न्याययिक विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार समाज के लिए एक चुनौती बन चुका है।

सभी सरकारों ने गरीबी उन्मूलन के लिए योजनाएं बनाई, लेकिन उन योजनाओं का लाभ आम जनता तक पहुंचने के पहले ही नेता और नौकरशाह हड़प कर लेते हैं। कमजोर कानून-व्यवस्था और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। अधिकांश भ्रष्टाचारी कानून की गिरफ्त से बच निकलते हैं।

भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मबजूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, दूरगामी और वास्तविक उपायों को लागू करना होगा। भ्रष्टाचार पर विजय प्राप्त करने के लिए राष्ट्र के हर नागरिक को आगे आना होगा।
हिमांशु शेखर, केसपा, गया

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