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चौपालः पाक पर नकेल

अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवादी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने और उनके खात्मे के लिए दी जाने वाली तकरीबन 2,130 करोड़ रुपए की सैन्य मदद रोकने का निर्णय लिया है।

Author September 10, 2018 2:57 AM
अमेरिका के ताजा कदम से पाक के खिलाफ भारतीय रणनीति को भी बल मिलेगा।

पाक पर नकेल

अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवादी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने और उनके खात्मे के लिए दी जाने वाली तकरीबन 2,130 करोड़ रुपए की सैन्य मदद रोकने का निर्णय लिया है। यह तमाम आर्थिक मुश्किलों में घिरी पाकिस्तान सरकार के लिए बड़ा झटका है। अमेरिका का साफ कहना है कि पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्क और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल रहा है और अपने यहां तमाम आतंकी संगठनों को खुले तौर पर पनाह दे रहा है। उसने इस साल की शुरुआत में भी पाकिस्तान को दी जाने वाली 3,531 करोड़ की आर्थिक मदद रोक दी थी।

अमेरिका के ताजा कदम से पाक के खिलाफ भारतीय रणनीति को भी बल मिलेगा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत लगातार साबित करने की कोशिश करता रहा है कि पाकिस्तान आतंकवादियों की पनाहगाह बना हुआ है। अमेरिका ने पाकिस्तान की आर्थिक मदद पर रोक लगा कर एक तरह से भारत के पक्ष को और ही मजबूत किया है। कुछ महीने पहले ही पाकिस्तान में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) का सम्मेलन रद्द होने का कारण पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियां ही रही हैं। पिछले दिनों काठमांडो में हुए बिम्सटेक सम्मेलन में इसके सदस्य देशों भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका और थाईलैंड ने मिल कर आतंकवाद से लड़ने के लिए पूर्ण सहमति बनाई है और इसका सीधा इशारा पाकिस्तान कीतरफ ही है। लिहाजा, पाकिस्तान को अपनी आतंकी गतिविधियों और आतंकवादियों को पनाह देने की नीति से बाज आना चाहिए वरना वहां हालात और भी बुरे हो सकते हैं। इससे उसकी छवि एक आतंकवादी देश की बन सकती है और वह विश्व में अलग-थलग पड़ सकता है।

साहित्य मौर्या, जामिया मिल्लिया, दिल्ली

सुधार और सरोकार

जब हम देश में शैक्षिक सुधार की बात करते हैं तो हमें सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा की ओर ध्यान देना चाहिए क्योंकि कई शोध खुलासा करते हैं कि देश भर में प्राइमरी स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या बहुत ज्यादा है। यदि सौ बच्चे पहली कक्षा में दाखिला लेते हैं तो उनमें से लगभग आधे बच्चे ही पांचवीं कक्षा तक पहुंच पाते हैं। इससे अनुमान लगा सकते हैं कि आठवीं और दसवीं कक्षा तक जाते-जाते यह आंकड़ा क्या होता होगा! दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे को फेल न करने से यह आशय कतई नहीं था कि अब उन्हें पढ़ाना नहीं है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम में यह बात जिस उद्देश्य के साथ शामिल की गई थी शायद वह नीचे आते-आते कुछ भिन्न अर्थ में ही परिणत हो गई।

उसकी मूल भावना ही नष्ट हो गई। कुल मिला कर जितने भी नीति और कानून बनते हैं उन सभी का मकसद होता है कि बच्चे पढ़ें और इसके लिए देश को हर स्तर पर प्रयास करना होगा। लेकिन हम करते कुछ और हैं और तुलना विदेशों से करते हैं। यदि हम अपने देश के सरकारी स्कूलों की तुलना विकसित देशों के स्कूलों से करते हैं तो हमें यह भी जानना चाहिए कि वे अपने यहां शिक्षा के लिए जीडीपी का कितना धन खर्च करते हैं। उनकी नीतियां, उनका पाठयक्रम क्या है? उनके यहां शिक्षकों के चयन की क्या प्रक्रिया है। और हमारे यहां और क्या करने की जरूरत है ताकि हम जिस तरह का बदलाव शिक्षा से समाज में चाहते हैं वह संभव होता हुआ दिखे।

प्रेरणा, भोपाल

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