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चौपाल: जलवायु के आयाम

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन और वातावरण के तापमान में हो रही वृद्धि मानवीय सभ्यता के इतिहास की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। पेरिस जलवायु समझौता इस समस्या के कारकों की पहचान करने और उससे निपटने के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत करता है।

जलवायु परिवर्तन से आ रही आपदाएं। फाइल फोटो।

भारत आज भी अपनी ऊर्जा का बहत्तर फीसद कोयले से प्राप्त करता है, जो ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में अहम घटक है। दूसरी तरफ बाइडेन ने भी 2050 तक जलवायु तटस्थता की बात कही है। इसलिए दोनों देशों के समान लक्ष्य एक दूसरे के सहयोग से पूरे हो सकते हैं। हालांकि पेरिस जलवायु समझौते में कुछ खामियां भी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पेरिस समझौते के तहत सदस्य देशों द्वारा निर्धारित एनडीसी तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे रखने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इस तथ्य को संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर फ्रेमवर्क कन्वेंशन द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया था। साथ ही इस समझौते के तहत विकासशील देशों को सहयोग देने के लिए निर्धारित सौ बिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि बहुत कम है। साथ ही इस समझौते के तहत निर्धारित कई मुद्दों, जैसे- कार्बन क्रेडिट, निवेश, समान उत्तरदायित्त्व, अनुच्छेद-6 के अंतर्गत ‘समान समय सीमा’ की अनिवार्यता आदि को लेकर सदस्य देशों में सहमति नहीं बन पाई है।
पेरिस समझौते के तहत सदस्य देशों को उनकी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए और इस समझौते के अन्य प्रावधानों के प्रति उनके उत्तरदायित्वों को निर्धारित करने के लिए नियमों को मजबूत किया जाना चाहिए।

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन और वातावरण के तापमान में हो रही वृद्धि मानवीय सभ्यता के इतिहास की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। पेरिस जलवायु समझौता इस समस्या के कारकों की पहचान करने और उससे निपटने के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत करता है। ऐसे में भारत और अमेरिका के साथ विश्व के अन्य देशों को मिल कर इस चुनौती से निपटने में योगदान देना चाहिए। भारत और अमेरिका की जुगलबंदी जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर नए आयाम स्थापित करेगी।
’रोहित कुमार, आइजीएमसी, शिमला, हिप्र

व्यवस्था में वंचित
एक खबर के मुताबिक मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में पिछले दस-बारह दिनों के अंदर चौदह मांओं की गोद उजड़ गई। इसके लिए कोई और नहीं, बल्कि हमारी निष्क्रिय सरकारें जिम्मेदार हैं। अफसोसनाक यह है कि इस घटना के बाद भी सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगी, क्योंकि न तो कोई अधिकारी और न कोई जनप्रतिनिधि पीड़ितों का हाल जानने आया। इससे स्पष्ट है कि हमारी नीतियां और व्यवस्था किनके लिए लिए और हाशिये के लोगों के लिए उनमें क्या जगह है। ऐसा लगता है कि हमारे पास एक केवल लाचार तंत्र है, जिसमें जगह बदलती है, परिणाम नहीं।

हमें यह जानना होगा कि ऐसी स्थितियां हमारे सामने क्यों बार-बार आती हैं। इसके लिए कुछ मुख्य कारण जिम्मेदार हैं। पहला कारण नौकरशाही का अति निष्क्रिय होना है। किसी सरकार की नीतियों को जमीनी स्तर पहुंचाने का काम नौकरशाहों पर होता है। लेकिन यह अफसोसजनक है कि हम इनके प्रशिक्षण पर लाखों रुपए खर्च कर लेते हैं और इसके बाद भी परिणामों में कोई सकारात्मक सुधार नजर नहीं आता। दूसरा कारण है राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी। हम अक्सर ऐसे मामलों पाते हैं कि सत्ताधारी दल के साथ-साथ विपक्ष भी अगर चुनाव नहीं है तो इसे तवज्जो नहीं देता। तीसरा कारण है जवाबदेही की बेहद ज्यादा कमी, वह जनप्रतिनिधियों की हो या नौकरशाहों की। चौथा कारण है कि ऐसी घटनाएं घटने के बाद सरकारें सिर्फ खानापूर्ति के नाम पर अधिकारियों या कर्मचारियों को निलंबित करती हैं।

ऐसी घटनाओं में सामाजिक एकता का अधिकांश समय अभाव दिखता है, क्योंकि पीड़ित इंसाफ के लिए लड़ना चाहता है, लेकिन बाकी लोग साथ नहीं देते। फिर हमारा शिक्षित वर्ग भी इस प्रकार की घटनाओं का विरोध नहीं करता। दरअसल, विद्यार्थियों को कुछ इस तरीके से पढ़ाया जाता है कि वे इस प्रकार की घटनाओं का विश्लेषण ही नहीं कर पाते हैं और ऐसी घटनाओं को एक बड़ी समस्या के रूप में देखने का दृष्टिकोण नहीं रख पाते हैं।

ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह इस प्रकार की घटनाओं पर तत्काल कार्रवाई करे। वह भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कुछ उपाय कर सकती है। मसलन, बेहतर तरीके से काम करने वाली संस्थाओं को पुरस्कृत किया जा सकता है या फिर इनमें स्वास्थ्य प्रतिस्पर्धा कराई जा सकती है। नौकरशाहों को मिला अत्यधिक संरक्षण कम किया जाए। व्यवस्था को कुछ इस तरीके से बनाया जाए कि सबकी ठोस जवाबदेही सुनिश्चित हो। शिकायती व्यवस्था को बेहद सरल बनाया जाए। जो सरकार की पूर्व नीतियां या कल्याणकारी योजनाएं हैं, उनको ही बेहतर तरीके से लागू करा दिया जाए तो उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाएं नहीं घटेंगी।
’सौरव बुंदेला, भोपाल, मप्र

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