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चौपालः संतुलन की दुविधा

तुर्की ने इस घटनाक्रम को लेकर संयुक्त अरब अमीरात को अपने कूटनीतिक संबंधों को तोड़ने की धमकी भी दी है। हालांकि तुर्की खुद ही इस्राइल के साथ व्यापारिक संबंध रखता है।

तुर्की ने इस घटनाक्रम को लेकर संयुक्त अरब अमीरात को अपने कूटनीतिक संबंधों को तोड़ने की धमकी भी दी है।

पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात ने इस्राइल के साथ अब्राहिम समझौता के तहत अपने कूटनीतिक संबंधों को स्थापित करने की घोषणा की, जिसे लेकर अरब जगत दो गुटों में बंटा हुआ नजर आता है। मिस्र और जॉर्डन जैसे देशों ने जहां इस समझौते का स्वागत किया, वहीं तुर्की और ईरान ने अपनी असहमति जताई। चौदह मई 1948 को इस्राइल पहला यहूदी देश बना और तभी से इस्राइल और अरब देशों में संघर्ष की शुरुआत हुई। अरब देशों का आरोप है कि इस्राइल फिलिस्तीनियों का जमीन हड़प रहा है और यही कारण है कि अरब देश उसे एक राष्ट्र के रूप में पहचान और मान्यता नहीं देते।

तुर्की ने इस घटनाक्रम को लेकर संयुक्त अरब अमीरात को अपने कूटनीतिक संबंधों को तोड़ने की धमकी भी दी है। हालांकि तुर्की खुद ही इस्राइल के साथ व्यापारिक संबंध रखता है। तुर्की के इस कदम का एक बड़ा कारण इस्लामिक जगत में आर्दोआन को एक नेता के रूप में पेश करना है। यहां तक कि तुर्की ने आतंकी संगठन हमास को भी इस्राइल के विरुद्ध समर्थन देने की बात कही है, जिसकी संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों ने कड़ी निंदा की है। पाकिस्तान ने इजराइल को एक देश के रूप में पहचान देने से इनकार किया है, जिसका दीर्घकाल में भारत के लिए एक सकारात्मक परिणाम सिद्ध हो सकता है, क्योंकि इस्राइल हथियारों का एक बड़ा निर्यातक देश है और आने वाले समय में भारत इस्राइल के साथ अपना दीर्घकालिक रक्षा समझौता स्थापित कर सकता है।

मध्य-पूर्व के इन घटनाक्रमों से भारत को लाभ होता दिख रहा है, क्योंकि अब भारत न केवल इजरायल और अरब देशों के साथ संयुक्त रूप से अपने संबंधों को आकार दे सकता है, बल्कि कश्मीर के मुद्दे को लेकर तुर्की के बयानों को प्रति-संतुलित करने के लिए इस्राइल का समर्थन भी कर सकता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जिस तरह के पेच सामने आते रहे हैं, उसमें भारत को इस्राइल की ओर फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाना चाहिए। स्थानीयता का तकाजा और पड़ोस की सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था भारत के लिए प्राथमिकता में सबसे ऊपर है। उसे मजबूत करने की शर्तों पर ही भारत को किसी अन्य देश को तरजीह देना चाहिए।
’प्रिंस कुमार, प्रयागराज, उप्र

भ्रम का चेहरा
पिछले दिनों जब यह खबर आई कि उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने अपने कुछ विभाग अपने बहन किम यो जोंग को सौप दी है, तभी से उनकी सेहत के बारे में तरह-तरह के अफवाहों को हवा दी जाने लगी। जानकार लोग कहने लगे कि लगता है किम जोंग उन की सेहत बहुत ही खराब है। इसलिए उन्होंने अपने कुछ दायित्व को अपने बहन को दे दिया है। मगर जब 26 अगस्त को उनका एक वीडियो सामने आया, जिसमें वे देश में महामारी और तूफान के बारे में सावधानी बरतने के लिए कहते देखे गए, तब अफवाह उड़ाने वाले बिल्कुल खामोश हो गए। तानाशाह का नियम ही होता है कि वह अपने बाद सत्ता की बागडोर अपने संतान को सौंपता है। मगर किम का पुत्र अभी बहुत छोटा है, इसलिए उन्होंने अपना कुछ दायित्व अपने बहन को सौंपा है। इसलिए उत्तर कोरियाई तानाशाही का अभी अंत नहीं होने वाला है। यों भी अभी तक उनके बारे जिस तरह की और जितनी बार अफवाह भरी खबरें उड़ चुकी हैं, उसे देखते हुए उनसे संबंधित किसी खबर पर जल्दी भरोसा करना शायद ठीक नहीं है।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

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