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दोस्ती दुश्मनी

पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ में छपे एक लेख के मुताबिक पाकिस्तानी दुकानदारों को अगर पता चलता है कि आप भारत से हैं, तो वे आपके लिए कुछ पैसे कम कर देते हैं..

Author नई दिल्ली | Updated: January 1, 2016 10:46 AM
Pathankot Attack, India Pakistan Talk, Delhi, Pakistan, India‘निकट भविष्य’ में विदेश सचिव स्तर की बातचीत के लिए गुरुवार को सहमत हुए भारत और पाकिस्तान इसी माह वार्ता कर सकते हैं।

पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ में छपे एक लेख के मुताबिक पाकिस्तानी दुकानदारों को अगर पता चलता है कि आप भारत से हैं, तो वे आपके लिए कुछ पैसे कम कर देते हैं। कई पाकिस्तानी लोग भारतीयों से पूछते हैं कि क्या भारतीय भी उन्हें पसंद करते हैं! शायद ही कोई इस सवाल का स्पष्ट उत्तर दे पाए। पाकिस्तान में रहने वाले सभी लोग भारतीयों को पसंद नहीं करते, पर अधिकतर लोगों की भारत के नागरिकों के प्रति प्रेम की भावना है। वहीं भारत में कई लोग मानते हैं कि भारतीयों और पाकिस्तानियों की भाषा, रहन-सहन, स्वभाव में काफी समानताएं हैं। पर काफी लोग ऐसे भी हैं जो भारत और पाकिस्तान को धर्म से जोड़ कर देखते हैं।

बहरहाल, जब मैं छठी कक्षा में पढ़ती थी तो हमारी एक मुसलिम शिक्षिका थीं जो भूगोल पढ़ाती थीं। एक दिन उन्होंने सभी बच्चों से पूछा कि बड़े होकर वे क्या बनना चाहते हैं और क्यों! सभी बच्चों ने अलग-अलग जवाब दिए। उनमें से एक ने कहा कि मैं सेना में जाना चाहता हूं। दूसरे बच्चों की तरह जब शिक्षिका ने उससे भी वजह पूछी तो उसने कहा कि मैं इसलिए सेना में जाना चाहता हूं, ताकि मैं अपने देश की रक्षा कर सकूं और देश के दुश्मनों को हरा सकूं। पीछे से किसी बच्चे ने पूछ लिया कि कौन हैं हमारे देश के दुश्मन! उस बच्चे ने तुरंत जवाब दिया- पाकिस्तान। टीचर ने बड़े प्यार से उस बच्चे से कहा- ‘बेटा, पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है, दुश्मन नहीं।’ उस बच्चे ने बस यह कहा कि ‘मैम, मुझे पता है कि आप पाकिस्तान की तरफदारी क्यों कर रही हैं!’ उस बच्चे ने शिक्षिका के नाम से उनका मजहब बताया। यह सुनते ही शिक्षिका की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने तो सिर्फ उसे समझाना चाहा था कि पाकिस्तान के लोग हमारे दुश्मन नहीं हैं, पर उस बच्चे की बात ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था। क्या इसमें बच्चे की कोई गलती थी? मेरा मानना है कि बच्चे के मानस को जिस परिवार, समाज और सत्ता ने तैयार किया, उसने उसे ऐसा सोचने के लिए मजबूर किया।

2015 में भारत में दो बड़े आतंकी हमले हुए। एक हमला बीस मार्च को जम्मू-कश्मीर में हुआ, जिसमें छह लोगों की मौत हुई और दूसरा सत्ताईस जुलाई को गुरदासपुर में हुआ, जिसमें दस लोगों की मौत हुई। यानी कुल मिला कर भारत में 2015 में हुए आतंकी हमलों में सोलह लोगों की मौत हुई। जबकि पाकिस्तान में 2015 में आतंकी हमलों में सतहत्तर सैनिकों, बत्तीस पुलिसकर्मियों और दो सौ सत्तासी आम लोगों, यानी कुल तीन सौ छियानबे लोगों की मौत हुई। क्या अब भी हम यही सोचते हैं कि पाकिस्तान में आतंकी हमले नहीं होते? क्या पाकिस्तानी लोग आतंकी हमलों में नहीं मरते? यह समझना होगा कि भारत और पाकिस्तान की दुश्मनी एक-दूसरे से नहीं, बल्कि आतंकवाद से है। हमें प्रण लेना होगा कि हमारे देशों की सेनाएं भले ही सरहद पर लड़ें, पर हम आपस में कभी नहीं लड़ेंगे। (वाग्मी जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड)

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शहादत की कड़ियां
देश के नौजवान सेना में इसलिए जाते हैं कि जब भी देश पर कोई मुसीबत आएगी तो वे अपना बलिदान देकर देश की हिफाजत करेंगे। देश की सीमा पर लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे देना तो समझ में आता है, लेकिन देश में बिना किसी युद्ध के ही अपनी जान गंवाना पड़े, ऐसा शायद ही कोई सैनिक सोचता होगा। दर्जनों मिग और सुखोई जैसे पुराने विमानों ने हमारे बहादुर सैनिकों को हमसे नाहक छीन लिया। ऐसे पुराने विमानों के भरोसे सैनिकों को क्यों छोड़ा जा रहा है, यह बात समझ में नहीं आती है। लगातार गलतियों के बाद भी नहीं संभलना रणनीतिकारों की मंशा पर सवाल खड़े करता है।

हाल ही में दिल्ली हादसे में मारे गए जवानों के परिजन यही पूछ रहे थे कि केवल सैनिकों के परिवार ही कब तक रोते रहेंगे? ऐसी व्यवस्था के बारे में क्या कहा जाए, जिसमें नौकरशाहों और नीतिकारों के लिए सर्वोच्च कोटि के वायुयान होते हैं, जिससे उनकी यात्रा सुरक्षित, आरामदायक और सुकून भरी होती है। लेकिन जिन पर देश की सीमा सुरक्षा का दायित्व होता है, उन्हें ‘मौत का उड़नखटोला’ दिया जाता है। आजादी के बाद से अब तक लगातार राष्ट्रभक्तों के लिए दोयम दर्जे का ही सुरक्षा दी जाती रही है, जबकि भ्रष्ट मंत्री या अफसर को भी जेड-प्लस या उससे भी अधिक की सुरक्षा में रखा जाता है। आज भी सैनिकों के कई परिवार हैं, जिन्हें एक-दो दफा तो फूल-माला चढ़ा कर, कुछ तमगे देकर खानापूरी कर दी जाती है। लेकिन उसके बाद उनके परिजनों को साल-दर-साल कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। सरकार बदलाव की बात कहती है। लेकिन बदलाव की शुरुआत सैनिकों की सुविधाओं से हो तो इससे सेना को उसके समर्पण का प्रतिदान मिल पाएगा। (अशोक कुमार, तेघड़ा, बेगूसराय)

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विकास के सामने
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में आज भी सिर पर मैला ढोने जैसी त्रासदी कायम है। हम इसे विकास की किस कसौटी पर रख कर देखेंगे? तमाम दावों के बावजूद आज भी लोगों को ऐसे अमानवीय कार्यों को करना पड़ता है, महज दो वक्त की रोटी के लिए। ऐसे कितने ही ग्रामीण इलाके हैं, जहां इस शर्मनाक मजबूरी में लोगों को जीना पड़ रहा है। इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? क्या उन्हें जो लोग ऐसा कार्य करवाते हैं या फिर उन्हें जो ऐसा कार्य करने को मजबूर हैं गरीबी के कारण? सच यह है कि इसके लिए समाज के वे ठेकेदार जिम्मेदार हैं, जो केवल नाम के लिए विकास का गुणगान करते हैं, जमीनी हकीकत से उनका कोई वास्ता नहीं होता। (ट्विंकल शेख, आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विवि)

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सरल सहज
जनजागरूकता और सामाजिक सशक्तीकरण के लिहाज से मैं सरकार को कुछ सुझाव देना चाहता हूं। पहला, संविधान में लिखित नागरिकों के दस मौलिक कर्तव्यों को आम लोगों को समझ में आ सकने योग्य सरल शब्दों में प्रचारित-प्रसारित किया जाए। संभव हो तो ‘क्या करें’ और ‘क्या नहीं करें’, दोनों को सरल शब्दों में समझाया जाए और उन पर विशेष जोर दिया जाए जो आमजन से व्यवहार में हो सकता है।

स्वामी विवेकानंद की याद में सबसे अच्छा कदम युवाओं को देशाटन, खासकर पदयात्राओं के माध्यम से आसपास के गांवों तक और साधन हों तो अन्य प्रदेशों में जाने, लोगों से मेलजोल बढ़ाने, किसी भी रूप में सेवा का अवसर देना हो सकता है। भारत के पास जो युवा-शक्ति है, उसका भरपूर उपयोग हो तो हमारे देश में क्रांति हो सकती है। (कमल जोशी, उत्तराखंड)

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