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ईंधन में आग

भारत जहां एक ओर कोरोना और कवक संक्रमण जैसी महामारी से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर तेजी से बढ़ रहे पेट्रोल और डीजल के दाम आम आदमी की जेब ढीली कर रहैं है।

पेट्रोल-डीजल के दामों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। (एक्सप्रेस फोटो)।

भारत जहां एक ओर कोरोना और कवक संक्रमण जैसी महामारी से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर तेजी से बढ़ रहे पेट्रोल और डीजल के दाम आम आदमी की जेब ढीली कर रहैं है। कई राज्यों में पेट्रोल सौ रुपए प्रति लीटर से ऊपर निकल चुका है। डीजल पनचानवे रुपए लीटर बिक रहा है। ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि आने वाले दिनों में भी इस बढ़ोतरी के थमने के कोई आसार नहीं हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतों का एक बड़ा कारण तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि है। वैश्विक बाजार में कीमत में वृद्धि का कारण विभिन्न देशों में महामारी प्रतिबंध हटने, आर्थिक गतिविधियों में तेजी, मांग बढ़ना और आपूर्ति कम होना है।

भारत अपनी जरूरत का अस्सी फीसद से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। लेकिन इस वक्त देश में तेल की कीमतें बढ़ने का कारण सिर्फ वैश्विक बाजार में कीमत बढ़ना ही नहीं है। इसके लिए आंतरिक कारक भी उतने ही जिम्मेदार हैं। इन आंतरिक कारकों में केंद्र सरकार एवं राज्यों द्वारा लगाए जाने वाला कर सबसे बड़ा कारण है, जो पेट्रोल एवं डीजल की कुल कीमत का साठ फीसद से भी ज्यादा बैठता है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि पेट्रोल सौ रुपए प्रति लीटर है तो साठ रुपए केवल कर के रूप में सरकारी खजाने में जाते हैं।

यदि मध्यप्रदेश में पेट्रोल की कीमतों पर नजर डालें तो यह सौ रुपए से ऊपर निकल चुका है। इससमें आधार मूल्य लगभग 35.63 रुपए, भाड़ा शुल्क 0.36 रुपए, डीलर कमीशन 3.79 रुपए, केंद्रीय उत्पाद शुल्क 32.90 रुपए है और राज्य सरकारें अपने यहां तैंतीस फीसद शुल्क और मूल्य वर्धित कर, और एक फीसद उप कर अलग से लगाती हैं। केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क में 2014 से 2021 के बीच तीन गुनी वृद्धि बढ़ोतरी कर चुकी है। राज्य सरकारें भी करों में वृद्धि करती जा रही हैं। यदि सरकार इन करों में कटौती नहीं करती है तो कीमतें लगातर बढ़ती रहेंगी। मूल्य नियंत्रण का एक और उपाय पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाकर किया जा सकता है। इस पर तुरंत गौर करने की जरूरत है।
’आयुष भालेकर, बरघाट, (मप्र)

भरोसे का टीका

केंद्र सरकार टीकाकरण को लेकर आए दिन एक नई घोषणा करती रही है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि कहीं भी स्थिति साफ नहीं है और लोग भारी गफलत में पड़े हैं और टीकाकरण केंद्रों के चक्कर काट रहे हैं। गौरतलब है कि टीके की पहली खुराक के बाद दूसरी के लिए लोग परेशान हैं। कहीं-कहीं दोनों टीके अलग-अलग कंपनियों के लगा देने के मामले भी सामने आए। ज्यादातर जगहों पर अठारह से चालीस वर्ष के आयु वर्ग के टीकाकरण के सरकारी आदेशों को लेकर भ्रम पैदा किया जा रहा है। टीके ही नहीं हैं। लोग अपनी बारी के बावजूद खाली हाथ लौटने को मजबूर हो रहे हैं। इसके अलावा दूसरा बड़ा संकट लोगों के भीतर टीके को लेकर बैठा खौफ है।

उन्हें लग रहा है कि टीके से जान जा सकती है। हाल में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में तो कुछ ग्रामीण टीकाकरण टीम को देख कर नदी में कूद कर भाग निकले। गुजरात, राजस्थान आदि राज्यों के ग्रामीण इलाकों में भी यही हालात हैं। ऐसे में गांवों में टीकाकरण सफल हो तो कैसे, यह बड़ा सवाल है। देश की कुल आबादी का सत्तर फीसद हिस्सा गांवों में ही रहता है। दूसरी लहर में गांवों में भी कोरोना तेजी से फैला है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती गांवों में कोरोना को फैलने से रोकने की है। इसके लिए व्यापक स्तर पर लोगों में जागरूकता पैदा करने और बड़ी संख्या में टीकाकरण केंद्र खोलने की जरूरत है। टीकाकरण को सफल बनाने के लिए लोगों में भरोसा पैदा करना जरूरी है। लोग समाचार माध्यमों, टीवी आदि पर जिस तरह से टीके के बारे में नकारात्मक खबरें देखते-सुनते हैं उससे भी उनके मन में डर पैदा हो रहा है।
’पंकज कुमार मिश्रा, केराकत (जौनपुर)

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