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चौपाल: उत्सव के रंग

खुशी के पर्व को लोग व्यसनों से अपने मन को तृप्त करके त्योहार का पूर्ण होना मान लेते हैं। इस मौके पर मदिरा पान, जुआ खेल कर अपना धन बर्बाद करने जैसी कुप्रथाए समाज में लंबे समय से चली आ रही है। आज समय बदल रहा है, लोगों की सोच बदल रही है, वहीं चंद लोग अपनी संकीर्ण मानसिकता को त्याग नहीं पा रहे हैं।

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भारत एक उत्सवधर्मी देश है, जहां उत्सवों का अपना एक अलग रंग देखने को मिलता है। यह उत्सव ही है जो भारत की एकता और अखंडता को कायम रखे हुए है। इस समय दीपावली का हम सभी अपने चौबारे में स्वागत करने के लिए तैयार हैं। यह पर्व अपने साथ एक प्राचीन पौराणिक भारतीय विरासत को समेटे हुए है। भारत ने मानवीय मूल्यों को दिल से सम्मानित किया है। लेकिन आज इस पर्व पर कुछ बदलाव की महती आवश्यकता दिखाई पड़ती है, जिसे अगर समय रहते बदल लिया गया तो हमारी भारतीय संस्कृति की विरासत भी बची रहेगी और ये पर्व भी अपनी गौरवगाथा सदैव गाते रहेंगे।

देखा जाए तो इस खुशी के पर्व को लोग व्यसनों से अपने मन को तृप्त करके त्योहार का पूर्ण होना मान लेते हैं। इस मौके पर मदिरा पान, जुआ खेल कर अपना धन बर्बाद करने जैसी कुप्रथाए समाज में लंबे समय से चली आ रही है। आज समय बदल रहा है, लोगों की सोच बदल रही है, वहीं चंद लोग अपनी संकीर्ण मानसिकता को त्याग नहीं पा रहे हैं। यह पर्व धन को प्रतिष्ठा और सम्मान देने का है, देव उपासना का है, न कि धन को व्यसनों के माध्यम से बर्बाद करने का है।

दूसरी ओर इन दिनों एक जंग भी छिड़ी है जिसमें दो सोच के लोग अपना-अपना मत दे रहे हैं। एक वर्ग इस पर्व पर रोशनी और आतिशबाजी करने के पक्ष में तर्क दे रहा है तो दूसरा पक्ष पर्यावरण अनुकूल दीपावली पर्व मनाने की बात कर रहा है। अगर प्रथम पक्ष की बात करें तो उनके तर्क में कहीं न कहीं एक होड़ का छिपा होना दिखाई पड़ता है, जिसमें अपनी शानो-शौकत और धन का प्रदर्शन करना है। लेकिन जरा सोचिए कि हम पटाखों के धुएं को वायु में कब तक घोलते रहेंगे? क्या हम प्राणवायु को इतना जहरीला बना देंगे जिसमें हम खुद ही सांस न ले पाएं?

आज बाजार में आतिशबाजी के कई वैकल्पिक मनोरंजक माध्यम उपलब्ध है और आभासी दीपावली का नया रूप भी लोगों को खूब भा रहा है। तो क्यों नहीं इस बार हम सभी दीपावली को पर्यावरण अनुकूल मनाएं तथा अपने धन को बर्बाद न करके, इसका प्रयोग बेसहारा और निर्धन को फल, मिठाई के रूप में खुशियां बांट कर करें, ताकि हमारी तरह उनके चौबारे में भी त्योहारों की खुशियां डेरा डाल सकें। तभी सच्चे अर्थों में खुशियों की दीपावली होगी।
’गौरव सक्सेना, इटावा, उप्र

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