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चौपाल: जैव-विविधता की जगह

भारतीय उपमहाद्वीप में भी कुल सैंतीस आर्द्र भूमि इसी सभागम द्वारा ही स्थापित की गई है। 1972 में एमआइटी, अमेरिका द्वारा प्रकाशित ‘द लिमिट्स टू ग्रोथ’ में घातांकीय रूप से वृद्धि कर रही अर्थव्यवस्था एवं जनसंख्या को संसाधनों की सीमित उपलब्धता से जोड़ने का प्रयास किया गया था। यह वही वर्ष है जब पर्यावरण को लेकर पहली बार स्वीडन के स्टॉकहोम में पृथ्वी शिखर-सम्मेलन का आयोजन किया गया था।

Updated: November 19, 2020 6:55 AM
पर्यावरण संरक्षण की जरूरत। फाइल फोटो

भारत विविधताओं का देश है और ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में पर्यावरण को यहां प्रकृति एवं जीवन का अभिन्न अंग माना जाता रहा है। ग्रंथों से लेकर तमाम रचनाओं में इसके उदाहरण मिलते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस देश का पर्यावरण संरक्षण को लेकर इतना विराट इतिहास रहा हो, आखिर वहां पर्यावरण के लिए क्यों रोना? कारण साफ है। प्रकृति को खुद के वश में करने की चाह, सांस्कृतिक क्रियाकलापों के बहाने पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करने की गंदी मानसिकता और सबसे महत्त्वपूर्ण खान-पान। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1980 के बाद से पूरे विश्व में प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता बढ़ी है।

इसके क्या कारण हो सकते हैं, क्या हमने इस पर ध्यान दिया है? हमारा गढ़ा हुआ विकास का मानक, आर्थिक सुदृढ़ता को पाने के लिए पर्यावरण को नोच डालने की विकृत मानसिकता, और तो और तारतम्य और लंबा टिकने वाले पर्यावरण संरक्षण के पारंपरिक आदर्शों से क्षणभंगुर और तथाकथित आधुनिक वैज्ञानिक विधियों की तरफ हमारी दूरदर्शिता का स्थानांतरण होना।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण से संबंधित सबसे पहली आवाज 1962 में ‘रासेल कारसन’ ने अपनी किताब ‘द साइलेंट स्प्रिंग’ के द्वारा उठाया था। उन्होंने अमेरिका में डीडीटी से होने वाले खतरे से आगाह किया था और यह बताया था कि वह बसंत जो कभी चिड़ियों की चहचहाहट से गूंजता था, अब चुप है। उसके बाद 1967 में प्रकाशित ‘गैरेट हार्डिन’ ने अपनी किताब ‘ट्रेजेडी आॅफ द कॉमन्स’ में साधारण जनमानस से होने वाली त्रासदी का बहुत ही व्यापक दृष्टि में उल्लेख किया है। फिर 1971 में ईरान के रामसर में आयोजित सभागम ने जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए आधुनिक आर्द्र भूमि की नींव रखी।

भारतीय उपमहाद्वीप में भी कुल सैंतीस आर्द्र भूमि इसी सभागम द्वारा ही स्थापित की गई है। 1972 में एमआइटी, अमेरिका द्वारा प्रकाशित ‘द लिमिट्स टू ग्रोथ’ में घातांकीय रूप से वृद्धि कर रही अर्थव्यवस्था एवं जनसंख्या को संसाधनों की सीमित उपलब्धता से जोड़ने का प्रयास किया गया था। यह वही वर्ष है जब पर्यावरण को लेकर पहली बार स्वीडन के स्टॉकहोम में पृथ्वी शिखर-सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जबकि कुछ लोग 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनारियो में आयोजित सम्मेलन को पहला पृथ्वी शिखर-सम्मेलन मानते हैं। 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद भारत ने भी 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम पारित किया, जिसने देश के राष्ट्रीय उद्यान, अभ्यारण्य एवं बायोस्फियर रिजर्व की स्थापना का मार्ग स्पष्ट किया। फिर ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ शुरू हुआ, ताकि बाघ संरक्षित हो पाएं।

इसके अलावा भी बहुत सारे नियम-कायदों और तमाम कोशिशों के बाद भी इंडिया स्टेट आॅफ फारेस्ट रिपोर्ट, 2019 के अनुसार भारत में जंगल का हिस्सा इसके कुल क्षेत्रफल का 21.67 फीसद है, जबकि एक राष्ट्र में समुचित पारिस्थितिकी संतुलन के लिए कम से कम उसके कुल क्षेत्रफल के तैंतीस फीसद भाग पर जंगल होना आवश्यक है। जंगलों की कटाई ने जैव-विविधता के नाश, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की गति को और भी ज्यादा तेज कर दिया है।

क्या जैवविविधता संरक्षण के लिए महज सम्मेलन, प्रोटोकॉल एवं कानून काफी है या फिर हमें सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयामों को भी संज्ञान में लेना चाहिए? जैव विविधता को संजोए रखने के लिए यह आवश्यक है कि हमारी योजना सबसे निचले स्तर से चोटी की ओर उन्मुख हो, न कि चोटी से निचले स्तर की ओर। यह तभी संभव हो सकता है जब हमारी योजनाओं में साधारण जनमानस की ज्यादा से ज्यादा सहभागिता होगी।
’उद्भव शांडिल्य, दिल्ली विवि, दिल्ली

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