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चौपाल: गणतंत्र के मूल्य

किसी भी राष्ट्रीय त्योहार को जो लोग महज एक अवकाश मान कर घर में आराम करते हैं, वैसे लोग देश के प्रति क्या भाव रखते होंगे, यह समझना मुश्किल नहीं है।

भगत सिंह। सांकेतिक फोटो।

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस किसी व्यक्ति विशेष का दिवस नहीं है, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की ओर से उन महान वीर सपूतों को नमन करने का दिन है, जिनके जीवनपर्यंत राष्ट्र के प्रति समर्पण और बलिदान की बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं।

आज जिस संविधान पर हम गर्व करते हैं, अपना और अपने परिवार या फिर समाज के साथ-साथ देश के विकास का सपना संजोते हैं, इसमें अपनी विशिष्ट पहचान बताते हैं, तो इन सभी का आधार हमारे संविधान पर ही टिका हुआ है। यह संविधान आजाद भारत के आजाद नागरिकों का संविधान है। गुलाम भारत में इतनी छूट संभव नहीं थी कि अपनी सोच को इतने व्यापक फलक पर नए आयाम दिए जा पाते। हमारे गणतंत्र ने ही ऐसी आजादी हमें मुहैया कराई है, हमें तमाम मौलिक अधिकार प्रदान किए हैं।

आज की तारीख में अधिकार और कर्तव्य की जद्दोजहद में लोग अधिकार को तो याद रखते हैं पर कर्तव्य भूल जाते हैं। यह प्रावधान जरूर होना चाहिए कि जिनके जरिए कर्तव्य भूलने वाले लोगों को कर्तव्य की याद भी दिलाया जाए। हर एक प्रकार के संस्थान, चाहे वह सरकारी हो या फिर गैरसरकारी, वहां राष्ट्रीय दिवसों को लेकर कर्तव्यबोध विकसित और सुनिश्चित कराया जाए।

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में शामिल होना अपना कर्तव्य होना चाहिए। इसके साथ-साथ सरकारों की भी जिम्मेदारी है कि वह गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस के प्रतीक से जुड़ी आजादी और लोकतांत्रिक अधिकार भी जनता को अनिवार्य रूप से मुहैया कराएं। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि लोकतंत्र और गणतंत्र के मूल्यों की जीवंतता से ही हमारा देश जिंदा रहा है, ताकत पाता रहा है और उसे बनाए रखने की जरूरत है।
’मिथिलेश कुमार, भागलपुर, बिहार

असुरक्षित बच्चियां

दो दिन पहले राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया गया। यह दिवस सन 2008 से मनाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य बालिकाओं को समान अधिकार दिलाना है और शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण सहित अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों पर जागरूकता पैदा करना है। अफसोस यह है कि इसके उलट हो रही घटनाएं सारी उम्मीदों को तोड़ती हैं।

राष्ट्रीय बालिका दिवस के तीन दिन पहले महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले के भोकर तहसील के दिवसी गांव में पांच साल की बालिका हैवानियत की शिकार हो गई। दिल को दहलाने वाली ये घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं, बल्कि बढ़ती ही जा रही हैं। यह तब हो रहा है, जब हमारे पास पॉक्सो जैसा कठोर कानून है।

सवाल है कि क्या इसक मतलब यह है कि महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ इंसानियत को झकझोर देने वाली घटनाओं को अंजाम देने वाले हैवानों के मन में कानून का कोई भय नहीं रह गया है? अगर ऐसा नहीं है तो आखिरकार ये घटनाएं बढ़ क्यों रही हैं? समाज में ऐसी मानसिकता क्यों बढ़ रही है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

आज का समाज कल का इतिहास हो जाएगा तो क्या हम आने वाली पीढ़ियों को ऐसा घृणित हैवानियतों से भरा इतिहास देंगे? समाज को आत्ममंथन करने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के अनुसार विश्व भर में पंद्रह से उन्नीस आयु वर्ग की करीब डेढ़ करोड़ किशोर बालिकाएं अपने जीवन में कभी न कभी यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं।

एक ओर हम नवरात्र में बालिका की पूजा करने का दिखावा करते हैं, लेकिन उस बालिका को सुरक्षित वातावरण देने का प्रयास हम कहां तक करते हैं! जब समाज में बालिकाएं सुरक्षित रहेंगी, तभी राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाना सार्थक होगा।
’आशीष रमेश राठौड़, चंद्रपुर, महाराष्ट्र

लोकतंत्र की खातिर

बिहार के वैशाली को गणतंत्र का जनक माना जाता है। दरअसल, भारत के पूर्वी भाग में पहले पहल बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ। जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर की जन्मस्थली वैशाली है। बौद्ध संघों के लोकतांत्रिक स्वरूप व सांगठनिक ढांचा से प्रेरित होकर शासन व्यवस्था के संदर्भ में गणतंत्र के सफल प्रयोग हुए होंगे। गणतांत्रिक मूल्यों की ताकत का अंदाजा इस बात से लगता है कि मगध के शासक अजातशत्रु को लिच्छवी जीतने के लिए सत्रह वर्षों तक अथक परिश्रम करने पड़े।

आज सबसे लोकप्रिय शासन व्यवस्था लोकतंत्र को माना जाता है। यही कारण है कि विश्व के अधिकतर देशों में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है। बावजूद इसके वर्तमान हालात को देख कर ऐसा लगता है कि आम जनों के लोकतांत्रिक मूल्यों के परवाह शासकों को नहीं है। विश्व के सबसे पुराने आधुनिक लोकतंत्र में पिछले कुछ समय से चल रहा है, वह लोकतंत्र के लिहाज से सकारात्मक नहीं है। उससे समानता की अवधारणा तार-तार होती नजर आई।

यों संपूर्ण विश्व लोकतांत्रिक लिहाज से सबसे बुरे दौर में गुजर रहा है। वैश्विक संस्थाओं की सार्थकता कठघरे में है। विभिन्न वर्ग आंदोलनरत हैं। लिहाजा लोकतांत्रिक मूल्यों की परवाह सबसे ज्यादा आमजन को करना होगा।
’मुकेश कुमार मनन, पटना, बिहार

आपदा में मुनाफा

महामारी जब चरम पर था, देश पूर्णबंदी झेल रहा था। उस समय आमजनों के साथ संवाद करते हुए एक बात कही जा रही थी कि हमें इस आपदा को अवसर में बदलना है। यह अपील कामगारों और किसानों से की गई थी। मगर इसे अमल में लाया देश के औद्योगिक घरानों ने। आॅक्सफेम की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश के अरबपतियों की संपत्ति पूर्णबंदी के दौरान करीब पैंतीस प्रतिशत बढ़ गई।

चौरासी फीसद आबादी को भारी नुकसान हुआ। अकेले अप्रैल 2020 में प्रति घंटा एक लाख सत्तर हजार लोगों की नौकरी जाती रही। यही स्थिति कमोबेश पूरे विश्व में रही। यानी सामान्य दिन भी अमीरों का और महामारी तो उनका था ही। यह इस रिपोर्ट से सामने आ गया।
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर, झारखंड

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