चौपाल: जीवन अनमोल है

अवसादग्रस्त होने पर मानसिक विशेषज्ञ की मदद लेना चाहिए। लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि समाज और सरकार ऐसी व्यवस्था और संस्कृति विकसित करे कि किसी भी तरह का दुख और एकाकीपन या अवसाद की हालत में कोई व्यक्ति खुद को अकेला नहीं महसूस करे और उसके आत्महत्या की ओर कदम बढ़ाने की नौबत नहीं आए।

वैश्वीकरण के दौर में हर कोई व्यस्त और अकेला है। मशीनी जिंदगी में भावनाएं भी मर रही हैं और बढ़ रही आत्महत्या की प्रवृत्ति।

देश में इन दिनों खुदकुशी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आई है। हाल ही में जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में हर घंटे कम से कम 15 लोगों ने खुदकुशी कर ली। देश में आत्महत्या का दर 13.9 प्रतिशत है और देश में खुदकुशी के मामलों में 2017 और 2018 के मुकाबले बढ़ोतरी देखी गई है।

रिपोर्ट के अनुसार 2019 में सत्तर फीसद पुरुषों ने आत्महत्या कर ली। इस आकड़े में तीस प्रतिशत महिलाएं भी शामिल हैं। गौरतलब है कि खुदकुशी के ये आंकड़े वर्ष 2019 के हैं, लेकिन कोरोना महामारी की वजह से देश जिस आर्थिक संकट का सामना कर रहा है और बेरोजगारी अपनी चरम सीमा पर है, ऐसे में खुदकुशी में इजाफा होने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। ऐसी कई घटनाओं की खबरें आई भी हैं कि किसी व्यक्ति ने अभाव और भुखमरी की हालत में आत्महत्या कर ली या किसी ने अपने परिवार के दूसरे सदस्यों की हत्या करके खुदकुशी कर ली। ये बेहद दुखद और त्रासद हालात हैं।

हालांकि भारत सरकार के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और स्नायु विज्ञान संस्थान की ओर से मानसिक परेशानियों से जूझ रहे नागरिकों के लिए हेल्पलाइन नंबर मुहैया कराया गया है, ताकि परेशानी से घिरे लोग इसकी मदद ले सकें। एक इंसान को अवसाद, पारिवारिक समस्याएं, प्रेम प्रसंग में धोखेबाजी, लंबी असहनीय बीमारी, बेरोजगारी, भुखमरी के हालात, नशाखोरी की लत, भारी-भरकम कर्ज का दबाव, जीवन में लगातार विफलताएं, जैसे प्रसंग खुदकुशी करके जान देने के लिए मजबूर करते हैं। इसलिए खुदकुशी करना एक सामाजिक बुराई है, लेकिन इसमें व्यवस्थागत अदूरदर्शिता की वजह से उपजी परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं।

देश में विद्यार्थी कम अंक हासिल करने के वजह से, किसान फसल में हुए नुकसान की वजह से, युवा बेरोजगारी की वजह से आत्महत्या कर लेते हैं। एक प्रकार से यह एक सरकारी, सामाजिक, पारिवारिक स्तर की विफलताएं हैं, जिसमें सुधार लाने के लिए सरकारी नीतियों में बदलाव और सामाजिक-पारिवारिक स्तर पर सोच बदलने की जरूरत है।

अक्सर देखा जाता है कि व्यक्ति कभी-कभी खुद की भावनाओं को समझ पाने में सक्षम नहीं होता और इससे उबरने के लिए उसे किसी दूसरे करीबी व्यक्ति की मदद की जरूरत होती है। लेकिन आजकल व्यस्त जीवन-शैली तथा अन्य कारणों से व्यक्तिगत संबंधों में दूरियां बनती जा रही हैं, जिसके चलते व्यक्ति के भीतर एकाकीपन की भावना जन्म लेती है और उसे यह दुनिया गमगीन करने लगती है।

इस स्थिति के ज्यादा बढ़ने की हालत में वह आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है। इससे निपटने के लिए पारिवारिक रिश्ते मजबूत होने चाहिए, व्यक्तियों का आपस में संवाद होना चाहिए, भावनात्मक व्यवस्थापन के बारे में व्यक्ति को जागरूक होना चाहिए। नशाखोरी से दूर रहना चाहिए, प्रतिदिन व्यायाम करके, किताबें पढ़ कर मन को खुश रखना चाहिए।

अवसादग्रस्त होने पर मानसिक विशेषज्ञ की मदद लेना चाहिए। लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि समाज और सरकार ऐसी व्यवस्था और संस्कृति विकसित करे कि किसी भी तरह का दुख और एकाकीपन या अवसाद की हालत में कोई व्यक्ति खुद को अकेला नहीं महसूस करे और उसके आत्महत्या की ओर कदम बढ़ाने की नौबत नहीं आए। यह याद रखना चाहिए कि हर जीवन अनमोल है।
’निशांत महेश त्रिपाठी, कोंढाली, नागपुर

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