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व्यक्तिवाद की सीमा

यह अत्यंत दुखद है कि विभिन्न राजनीतिकों के कथन को आम नागरिकों द्वारा पूर्ण रूप से प्रामाणिक नहीं माना जाता। निरंतर अनर्गल प्रलाप, तथ्यहीन आरोप-प्रत्यारोप और पूर्वाग्रह की भावना के चलते राजनीति में शुचिता और पवित्रता के भाव दिखाई नहीं देते।

सांकेतिक फोटो।

यह अत्यंत दुखद है कि विभिन्न राजनीतिकों के कथन को आम नागरिकों द्वारा पूर्ण रूप से प्रामाणिक नहीं माना जाता। निरंतर अनर्गल प्रलाप, तथ्यहीन आरोप-प्रत्यारोप और पूर्वाग्रह की भावना के चलते राजनीति में शुचिता और पवित्रता के भाव दिखाई नहीं देते। दिनोंदिन विकृत होती जा रही राजनीति में नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन एक गहन चिंता का विषय है। स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारंभिक दशकों तक राजनीतिकों के प्रति आम नागरिकों का भरपूर विश्वास रहा। लेकिन जैसे-जैसे राजनीति नीति और सिद्धांतों से विमुख होती गई, वैसे-वैसे व्यक्तिकेंद्रित राजनीति का सिलसिला-सा चल पड़ा। वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में राजनीति की यही दुर्दशा नेतृत्व को टिकाए हुए है।

वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में विभिन्न राजनीतिक दलों की विचारधारा गौण होकर रह गई है और उसका स्थान व्यक्ति विशेष की विचारधारा ने ले लिया है। निश्चित ही यह स्थिति लोकतंत्र की स्वाभाविक अवधारणा से सर्वथा परे है। दरअसल, राजनीति में नैतिक मूल्यों का पतन अत्यंत चिंताजनक परिस्थितियां उत्पन्न कर चुका है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में व्यक्ति विशेष को लेकर वैचारिक ध्रुवीकरण नजर आता है। राजनीतिक जमात का एक वर्ग नेतृत्व के साथ खड़ा दिखाई देता है तो दूसरा नेतृत्व विरोधी गतिविधियों के आधार पर अपनी राजनीतिक सक्रियता का परिचय दे रहा है। ऐसी स्थिति में आम नागरिक भ्रमित अवस्था में दिखाई देते हैं। ऐसे में आम नागरिक किसी एक सर्वसम्मत निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाते।

यह सिलसिला किसी भी दृष्टि से हमारे लोकतंत्र की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। मुद्दा दल एवं व्यक्ति विशेष के समर्थन अथवा विरोध का नहीं है। वास्तव में लोकतंत्र में ‘लोकतंत्र’ दिखाई देना भी लोकतंत्र की अच्छी सेहत का सूचक सिद्ध होता है। अन्यथा कालांतर में लोकतंत्र के एकतंत्र के रूप में तब्दील हो जाने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। राजनीतिक पूर्वाग्रह की प्रबलता के चलते व्यक्ति विशेष के पक्ष अथवा विपक्ष में राजनीतिक शक्तियों का जमघट, एक प्रकार से एकतंत्र के सत्ता संघर्ष के रूप में दिखाई देता है। इस स्थिति को बदला जाना चाहिए। सवाल यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत। असल सवाल भविष्य के प्रति आशंका का है, जो निर्मूल नहीं है।

हालांकि वर्तमान नेतृत्व की नीति और नीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता, लेकिन इस आशंका के प्रति कौन आश्वस्त कर सकता है कि भविष्य में भी यही स्थिति हमारे सामने दिखाई देगी। वास्तव में देश के लोकतंत्र को व्यक्ति विशेष के पराक्रम पर नहीं छोड़ा जा सकता। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक होता है कि विभिन्न राजनीतिक दल अपनी-अपनी नीति और सिद्धांतों के आधार पर जनमत के समर्थन की आस करें। इसके लिए उसकी एक स्पष्ट रूप से घोषित रीति-नीति भी होना चाहिए। इस समय तो यही स्थिति दिखाई देती है कि नकारात्मक या सकारात्मक जो कुछ हो रहा है, वह सब व्यक्ति विशेष के खाते में ही जा रहा है।

बावजूद इसके देश के समक्ष जब लोकतंत्र की अस्मिता ही दांव पर लगी दिखाई दे, तब हमें व्यक्तिगत विचारधारा के स्थान पर दलीय विचारधारा को प्रोत्साहन देना होगा। निश्चित रूप से देश के भविष्य को एक ही व्यक्ति पर दांव लगाते हुए आखिर हम अपने आप को सुरक्षित कैसे मान सकेंगे? इस बात के प्रति कौन किसको आश्वस्त कर सकता है कि कालांतर में लोकतंत्र की स्थिति आखिर कौन-सी करवट लेगी? इस संदर्भ में हमें नागरिकों की तासीर के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर भी गौर करने की जरूरत होगी। कुल मिला कर मुद्दे की बात यह है कि देश के भविष्य को व्यक्ति विशेष के हाथों सुरक्षित मानना आज नहीं तो कल को होने वाली एक गंभीर भूल सिद्ध होगी।
’राजेंद्र बज, हाटपीपल्या, देवास, मप्र

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